परिवार की अहमियत ......?
ओ पी उनियाल
परिवार क्या है? इसका जवाब साधारण शब्दों में तो यही होगा कि रिश्तों का जुड़ाव, आपसी सम्मान, प्यार। ज्यों-ज्यों रिश्ते जुड़ते जाते हैं त्यों-त्यों परिवार बढ़ता जाता है। इसमें प्यार-तकरार, सुख-दु:ख, हंसी-खुशी का जो समावेश होता है वही परिवार को बांधे रखता है। परिवार सामूहिक और एकल होते हैं।
सामूहिक परिवार तो अब बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। जहां आज भी सामूहिक परिवार हैं वहां सुख-दु:ख में सभी सदस्यों की बराबर भागीदारी होती है। कोई भी बात हो तो सब एकजुट होकर आगे आ जाते हैं। सबकी जिम्मेदारी अलग-अलग होती है। परिवार के मुखिया को हर बात पर नजर रखनी होती है। ताकि परिवार में किसी प्रकार का भेदभाव न हो। कहावत भी है न 'एकता में बल है'।
लेकिन, आज बदलते समय के साथ-साथ परिवार की परिभाषा भी बदलने लगी है। रिश्तों का जुड़ाव खत्म होता जा रहा है। एकजुट होकर कोई रहना ही नहीं चाहता। परिवार में जितने सदस्य हैं स्वतंत्रता से रहना चाहते हैं। सब अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलपाने पर उतारु रहते हैं। जिसके परिवार टूट रहे हैं, आपसी प्यार सिमट रहा है, अपनत्व खत्म हो रहा है। बच्चों का मां-बाप के प्रति, भाई-भाईयों की एक-दूसरे के प्रति भावनाएं कलुषित होती जा रही हैं। परिवार में जहां दरार पड़ी नहीं कि परिवार टूटने की नौबत बनी।
आखिर क्यों बन रही है यह स्थिति, क्या हमारी विचारधारा इतनी कुंठित हो चुकी है कि अपने परिवार को संगठित ही नहीं रख पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में किसी से भला क्या अपेक्षा रखी जा सकती है।