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हिंदी कविता : शोर

शोर सिर्फ़ कानों में नहीं गूंजता,
वह इंसान के भीतर भी उतर जाता है।
कभी बाज़ार की भीड़ बनकर,
कभी शहर की भागती सड़कों में,
तो कभी लोगों की ऊँची आवाज़ों में
धीरे-धीरे दिल की शांति चुरा लेता है।

सुबह का सूरज जब उगता है,
पक्षियों की मीठी ध्वनि सुनाई देती है,
पर शहरों में वह मधुरता
हॉर्न और मशीनों के शोर में
कहीं खो जाती है।
हर तरफ़ आवाज़ों का तूफ़ान है,
मानो दुनिया को चुप रहना भूल गया हो।

किसी गली में बच्चों की चीख-पुकार,
कहीं दुकानों के तेज़ स्पीकर,
कहीं राजनीति के नारों की गूंज,
तो कहीं रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट का शोर।
इंसान बाहर से जितना शांत दिखता है,
अंदर उतना ही शोर समेटे रहता है।

यह शोर सिर्फ़ ध्वनि नहीं,
यह बेचैनी का दूसरा नाम है।
जब मन उलझनों से भर जाता है,
जब सपने टूटने लगते हैं,
जब उम्मीदें थक जाती हैं,
तब भीतर एक अजीब शोर उठता है,
जो किसी को सुनाई नहीं देता।

कभी-कभी रात बहुत शांत होती है,
सड़कें भी सो जाती हैं,
हवा भी धीरे चलती है,
पर तब भी मन के भीतर
विचारों का तूफ़ान चलता रहता है।
यही सबसे बड़ा शोर है,
जो इंसान को अकेले में सताता है।

शोर से भरी इस दुनिया में
अब सन्नाटा भी डराने लगा है।
लोग अकेले होने से घबराते हैं,
क्योंकि अकेलेपन में
उन्हें अपने दिल की आवाज़ सुनाई देती है।
वह आवाज़ जो दिनभर के शोर में
दबकर रह जाती है।

पहले गाँवों में शांति बसती थी,
पेड़ों की सरसराहट संगीत लगती थी,
नदियों की धारा मन को सुकून देती थी,
पर अब वहाँ भी
मशीनों और भागदौड़ का शोर पहुँच गया है।
मानो इंसान ने प्रकृति से
उसकी खामोशी भी छीन ली हो।

कभी सोचो,
अगर दुनिया से सारा शोर मिट जाए,
तो शायद इंसान
अपने आप को बेहतर समझ पाए।
वह रिश्तों की असली कीमत जाने,
प्रेम की धीमी भाषा पहचाने,
और अपने भीतर छिपी
मानवता की आवाज़ सुन सके।

शोर हमें थका देता है,
हमारी सोच को बिखेर देता है,
पर खामोशी हमें जोड़ती है,
हमें अपने करीब लाती है।
इसलिए ज़रूरी है कि
हम थोड़ी देर रुकें,
अपने मन को शांत करें,
और इस भागती दुनिया के शोर से
कुछ पल दूर हो जाएँ।

क्योंकि जीवन की सबसे सुंदर बातें
कभी शोर में नहीं मिलतीं,
वे हमेशा खामोशी की गोद में
धीरे-धीरे जन्म लेती हैं।

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