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तिरंगे में लिपटकर गए जननायक "माधव बाबू" को अंतिम जोहार

तिरंगे में लिपटकर गए जननायक

गोमिया की माटी का वह सपूत जो 73 वर्ष की आयु में अनंत की यात्रा पर निकल गया
4 बार विधायक, 2 राज्यों में मंत्री, लेकिन दिल हमेशा जनता का,

विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार |


गोमियां: "जिन नेताओं को जनता 'बाबू' कहती है वे नेता नहीं, परिवार के सदस्य होते हैं। माधव बाबू ऐसे ही थे।"

अंतिम जोहार गोमिया की धरती नम हुई
13 मई 2026 को झारखंड की राजनीति के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री माधव लाल सिंह का बुधवार सुबह निधन हो गया।
वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और इलाज के लिए पहले बोकारो के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराए गए थे।
स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें रांची रेफर किया गया, जहां पल्स हॉस्पिटल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

उनके निधन की खबर फैलते ही गोमिया सहित पूरे क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।

वह लहर इसलिए नहीं कि एक पूर्व मंत्री गए वह लहर इसलिए कि एक अपना चला गया।

तिरंगे में लिपटी काया, कंधों पर उठाते हाथ, आँखों में आँसू और होंठों पर "अंतिम जोहार।"

यह दृश्य गोमिया की उस जनता का था जिसने माधव बाबू को न सिर्फ नेता माना बल्कि परिवार का हिस्सा।

कौन थे माधव बाबू जिनकी याद आज पूरा झारखंड कर रहा है,
माधव लाल सिंह जिन्हें लोग "माधव बाबू" के नाम से जानते थे सरल स्वभाव के ऐसे नेता थे जो जनता के बीच रहने में विश्वास करते थे।

73 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।

उन्होंने 1985, 1990, 2000 और 2009 में गोमिया विधानसभा सीट से जीत दर्ज की।
यानी चार अलग-अलग दशकों में चार बार जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना।

3 बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में और 1 बार कांग्रेस की टिकट पर।
यह तथ्य बताता है कि उनकी जीत किसी दल की नहीं व्यक्तित्व की जीत थी। जनता ने पार्टी नहीं, माधव बाबू को वोट दिया।

पुल-कोट:
"वे सिर्फ हमारे दादा जी नहीं थे वे पूरे गोमिया की पहचान थे।"
पवन लाल सिंह, पोते,

दो राज्यों का सम्मान बिहार और झारखंड दोनों में मंत्री
साल 2000 में बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और जब उसी वर्ष झारखंड अलग राज्य बना, तो झारखंड सरकार में भी मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।

वे उन विरले नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने दो राज्यों की कैबिनेट में हिस्सा लिया।
यह इतिहास में एक दुर्लभ उपलब्धि है।
लेकिन जो बात उन्हें महान बनाती है वह मंत्रिपद नहीं था।
वह था गोमिया की गली-गली में उनकी उपस्थिति, आम लोगों की समस्याओं में उनकी भागीदारी और बिना किसी भेदभाव के सबके लिए उपलब्ध रहना।

राजकीय सम्मान राज्य ने दिया अपना सर्वोच्च सम्मान
झारखंड सरकार द्वारा पूर्व मंत्री सह पूर्व विधायक गोमिया की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ करने का फैसला किया गया।

पूर्व मंत्री माधव लाल की पार्थिव शरीर को झारखंड विधानसभा परिसर में अंतिम दर्शन के लिए लाया गया।
मंत्री दीपिका पांडे और मंत्री योगेंद्र प्रसाद महतो के साथ-साथ विधानसभा अधिकारियों और कर्मचारियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने X पर लिखा: "माधवलाल सिंह ने लंबे समय तक जनसेवा और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका निधन सार्वजनिक जीवन के लिए अपूरणीय क्षति है।"

तिरंगे में लिपटकर जब उनकी अंतिम यात्रा गोमिया की गलियों से गुजरी हजारों लोगों की आँखें भीग गईं।
वे रो रहे थे क्योंकि एक जननायक गया था, जो उनका था।

गोमिया जो माधव बाबू की पहचान है,
गोमिया विधानसभा क्षेत्र झारखंड के बोकारो जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण सामान्य सीट है, जो गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है।
इस इलाके की खासियत ही यही है कि आम लोगों से सीधे जुड़ाव बने बगैर कोई नेता नहीं बन सकता।
माधव सिंह जनता के बीच रहने वाले नेताओं में जाने जाते थे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि माधव लाल सिंह हमेशा आम लोगों के लिए उपलब्ध रहते थे और क्षेत्र के विकास के लिए लगातार प्रयास करते थे।

उनके निधन से गोमिया क्षेत्र में एक राजनीतिक और सामाजिक शून्य पैदा हुआ है।

पोते की आँखों में एक परिवार का दर्द, एक जनपद का दर्द
पोते पवन लाल सिंह ने भावुक होते हुए कहा: "वे सिर्फ हमारे दादा जी नहीं थे, बल्कि परिवार के लिए भगवान थे।
इतना ही नहीं, वे पूरे गोमिया की पहचान थे। दादा जी ने पूरी जिंदगी जनता की सेवा की।
आज उनका जाना हम सभी के लिए अपूरणीय क्षति है।"

यह शब्द किसी राजनीतिक भाषण के नहीं एक पोते की वह आवाज़ है जो बताती है कि माधव बाबू घर में भी वही थे जो बाहर थे सबके लिए, सबके साथ।

विरासत जो छोड़ गए माधव बाबू,
विश्लेषकों का मानना है कि उस दौर में गोमिया क्षेत्र की राजनीतिक दिशा तय करने में माधव लाल सिंह की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने न केवल चुनावी राजनीति में प्रभाव बनाए रखा, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दों पर जनमत तैयार करने में भी अहम योगदान दिया।

झारखंड आंदोलन, एकीकृत बिहार का संघर्ष, अलग राज्य की स्थापना इन सब ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में माधव लाल सिंह की सक्रिय भूमिका रही। वे उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने राजनीति को सेवा मानकर जीया।

विनम्र श्रद्धांजलि
बिहार-झारखंड के सीमांत क्षेत्र से आने वाले पाठकों के लिए माधव बाबू केवल एक नाम नहीं थे। वे उस राजनीतिक परंपरा के प्रतीक थे जो कहती थी: "नेता वह है जो जनता के दर्द को अपना दर्द समझे।"
आज जब राजनीति में चेहरे बदलते हैं, दल बदलते हैं, वफादारियाँ बदलती हैं तब माधव बाबू जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि जनता का विश्वास कमाने में दशक लगते हैं और खोने में एक पल।
माधव बाबू ने 73 वर्षों में कभी वह विश्वास नहीं खोया।
अंतिम जोहार जननायक माधव बाबू को।
तिरंगे में लिपटे देश की माटी में समाए।

स्व. माधव लाल सिंह 'माधव बाबू' की पावन स्मृति को विनम्रश्रद्धांजलि

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