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ईंधन संरक्षण अभियान के बीच असम राज्यपाल ने आधिकारिक काफिले में 70 प्रतिशत कटौती की:-

पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रधानमंत्री की अपील के बाद लिया बड़ा निर्णय, लोक भवन में बिजली खपत कम करने की भी पहल

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संसाधनों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच असम के राज्यपाल ने अपने आधिकारिक काफिले में 70% तक कटौती करने का बड़ा निर्णय लिया है। यह घोषणा 13 मई को की गई और इसे प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से की गई ईंधन संरक्षण की अपील के अनुरूप एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है।राजभवन की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राज्यपाल ने केवल वाहन उपयोग में कटौती तक ही अपने प्रयास सीमित नहीं रखे हैं, बल्कि राजभवन परिसर तथा लोक भवन में बिजली खपत कम करने के लिए भी कई संसाधन संरक्षण उपाय शुरू किए हैं। इन पहलों का उद्देश्य ऊर्जा बचत, प्रशासनिक दक्षता और सतत संसाधन प्रबंधन को बढ़ावा देना बताया गया है। सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य इससे पहले भी प्रशासनिक कार्यों में ईंधन उपयोग को लेकर सख्त रुख अपना चुके हैं। अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने पहले ही मानक ईंधन उपयोग में लगभग 10 प्रतिशत कटौती लागू कर दी थी। अब काफिले में 70 प्रतिशत की कमी को उसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य सरकारी संसाधनों का जिम्मेदार और नियंत्रित उपयोग सुनिश्चित करना है। राजभवन के अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऊर्जा संरक्षण केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी बन गई है। पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति व्यवस्था को लेकर लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे समय में सरकारी संस्थानों द्वारा ईंधन और बिजली की बचत को प्राथमिकता देना एक सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, लोक भवन और अन्य प्रशासनिक परिसरों में अनावश्यक बिजली उपयोग रोकने, सीमित वाहन उपयोग, साझा परिवहन व्यवस्था तथा ऊर्जा दक्ष उपकरणों के इस्तेमाल जैसे कदमों पर भी जोर दिया जा रहा है। आने वाले दिनों में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को भी इसी प्रकार के संसाधन संरक्षण उपाय अपनाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में राज्यपाल के इस निर्णय की व्यापक चर्चा हो रही है। कई विशेषज्ञों ने इसे प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ व्यावहारिक कदम भी बताया है, जो सरकारी खर्चों में नियंत्रण और पर्यावरणीय संतुलन दोनों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

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