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हिंदी कविता : ज़ोर

ज़ोर सिर्फ़ आवाज़ का नहीं होता,
ज़ोर सिर्फ़ बाजुओं का नहीं होता।
कुछ ज़ोर सपनों में होता है,
कुछ ज़ोर अपनेपन में होता।

जब बच्चा पहली बार गिरकर
फिर से उठना सीख जाता है,
तब उसके छोटे-से कदमों में भी
एक बड़ा ज़ोर आ जाता है।

जब माँ थकी हुई आँखों से भी
घर का दीप जलाती है,
उसकी चुप मेहनत में दुनिया का
सबसे सच्चा ज़ोर दिखाई देता है।

ज़ोर हवाओं का भी होता है,
जो पर्वतों से टकराती हैं,
और नदियों का भी होता है,
जो चट्टानों को काट जाती हैं।

लेकिन सबसे बड़ा ज़ोर तो
मनुष्य के इरादों में होता है,
जो अंधेरों से लड़कर भी
उजालों में जीना जानता है।

जिसके हौसले टूटते नहीं,
जिसकी उम्मीदें झुकती नहीं,
वही इंसान समय के आगे
अपनी पहचान बना जाता है।

ज़ोर तलवारों में कम होता है,
ज़ोर शब्दों में ज़्यादा होता है,
एक मीठी बोली का असर
हज़ारों दिलों पर होता है।

कभी किसान के हल में देखो,
धरती से सोना उग आता है,
उसके पसीने के हर कतरे में
मेहनत का ज़ोर समाता है।

कभी सैनिक की आँखों में देखो,
सीमा पर डटा रहता है,
देश की मिट्टी की रक्षा को
हर मुश्किल से लड़ता है।

कभी मज़दूर के हाथों में देखो,
पत्थर भी झुक जाते हैं,
उसके श्रम के आगे बड़े-बड़े
महल खड़े हो जाते हैं।

ज़ोर सिर्फ़ क्रोध में नहीं,
क्षमा में भी शक्ति होती है,
जो अपनों की भूल भुलाकर
फिर से रिश्ते जोड़ती है।

ज़ोर उस दीपक में भी होता,
जो आँधी में जलता रहता,
और अंधेरी रातों के भीतर
उम्मीदों का गीत कहता।

ज़ोर उस बूढ़े बरगद में है
जो धूप सभी को देता है,
अपने जीवन की अंतिम साँसों तक
धरती से प्रेम निभाता है।

ज़ोर कभी अहंकार न बन जाए,
इतना ध्यान भी रखना तुम,
क्योंकि ऊँचे पर्वत भी एक दिन
झुक जाते हैं समय के समक्ष।

सच्चा ज़ोर वही कहलाता
जो दूसरों का सहारा बने,
जो टूटे दिलों को जोड़ सके,
जो हर दुख में किनारा बने।

ज़ोर ज्ञान का, ज़ोर प्रेम का,
ज़ोर सच्चाई की राहों का,
ज़ोर इंसानियत के भीतर
जलते हुए उन चाहों का।

चलो ऐसा ज़ोर जगाएँ हम
जिससे दुनिया मुस्काए फिर,
नफ़रत की हर दीवार टूटे,
और प्रेम का दीप जल जाए फिर।

क्योंकि असली ज़ोर वही होता
जो मानवता को बचा सके,
जो हर दिल में आशा भर दे,
और जीवन को सजा सके।

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