पेट्रोल-डीजल के साथ CNG भी महंगी: जनता से बचत की अपील, सरकार ने खुद बढ़ाया बोझ
देश में पेट्रोल, डीजल के साथ CNG की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की जेब पर एक साथ तिहरा हमला किया है। सरकार जहां एक ओर जनता से ईंधन बचाने, विदेश यात्राएं टालने और संयम बरतने की अपील कर रही है, वहीं दूसरी ओर ईंधन कीमतों में सीधी बढ़ोतरी ने महंगाई की नई लहर खड़ी कर दी है।
शुक्रवार से पेट्रोल 3.14 प्रति लीटर और डीजल 3.11 प्रति लीटर महंगा हो गया है। दिल्ली में पेट्रोल लगभग 98 और डीजल 91 प्रति लीटर पहुंच गया है। वहीं CNG की कीमतों में भी 2 प्रति किलो तक की बढ़ोतरी कर दी गई है। इसका असर सिर्फ वाहन चालकों पर नहीं, बल्कि ऑटो-टैक्सी किराए, बस सेवा, माल ढुलाई और रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।
वैश्विक संकट का हवाला, लेकिन टैक्स पर चुप्पी:
सरकार और तेल कंपनियां ईरान-अमेरिका तनाव और महंगे क्रूड ऑयल को वजह बता रही हैं। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम पहले गिरे थे, तब जनता को उसी अनुपात में राहत क्यों नहीं मिली?
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का बड़ा हिस्सा टैक्स और ड्यूटी से तय होता है। केंद्र और राज्य सरकारें ईंधन पर भारी टैक्स वसूलती हैं, जिससे तेल सस्ता होने पर भी उपभोक्ताओं तक पूरी राहत नहीं पहुंचती।
चार साल तक स्थिर दाम या चुनावी रणनीति?
सरकार यह कह रही है कि चार वर्षों बाद कीमतें बढ़ाई गई हैं। लेकिन विपक्ष और आर्थिक विश्लेषकों का आरोप है कि लंबे समय तक कीमतें राजनीतिक कारणों से रोकी गईं और चुनावी माहौल खत्म होते ही जनता पर बोझ डाल दिया गया।
दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ सप्ताह पहले तक सरकार और PIB फैक्ट चेक पेट्रोल-डीजल महंगे होने की खबरों को फर्जी और भ्रामक बता रहे थे। अब वही कीमतें बढ़ने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या जनता को पहले से सच्चाई बताने से बचा गया?
सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीब पर:
CNG को अब तक सस्ता विकल्प माना जाता था, खासकर ऑटो चालकों, टैक्सी ड्राइवरों और मध्यम वर्ग के लिए। लेकिन अब गैस भी महंगी होने से रोज कमाने-खाने वाले तबके की लागत बढ़ेगी। परिवहन महंगा होगा तो सब्जियां, राशन, दूध, ऑनलाइन डिलीवरी और दैनिक जरूरतों का सामान भी महंगा होने की आशंका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर ही डाला जा रहा है, जबकि बड़ी कंपनियों को टैक्स राहत और प्रोत्साहन पैकेज मिलते रहे हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता और विकास के नारों के बीच आम आदमी लगातार बढ़ती लागत और घटती बचत से जूझ रहा है।