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पेपर लीक: मेधा का कत्ल या तंत्र की निर्लज्जता ?

"पंखों से नहीं अब हौसलों से डर लगता है, सजी-धजी इमारतों में अब खुदकुशी का मंजर लगता है। जहाँ कलम को रोशनी मिलनी थी 'मनीष', उस शहर में अब सपनों को अंधेरों से डर लगता है।"

भारत, जिसने कभी नालंदा और तक्षशिला बनकर दुनिया को ज्ञान का मार्ग दिखाया, आज उसी की सड़कों पर देश का सबसे मेधावी युवा अपनी योग्यता का प्रमाण पत्र लिए न्याय की भीख मांग रहा है। NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार होती 'पेपर लीक' की घटनाएँ अब केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर किया गया एक सोची-समझी साजिश है।

जब एक प्रश्नपत्र लीक होता है, तो वह केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं होता। वह उस मध्यमवर्गीय माँ की रसोई की कटौती होती है, जिसने पाई-पाई जोड़कर बेटे की कोचिंग फीस भरी थी। वह उस किसान के माथे के पसीने की बूंद होती है, जिसने अपनी पुश्तैनी ज़मीन गिरवी रखकर बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना संजोया था।

विशेषकर हमारी बेटियों के लिए, यह एक "अघोषित अंत" जैसा है। हमारे समाज में लड़कियों की शिक्षा आज भी एक 'समय-सीमा' (Deadline) की बेड़ियों में जकड़ी है। पेपर लीक होने का अर्थ हैउसकी मेहनत का एक और साल बर्बाद होना। अक्सर यही एक साल उसकी पढ़ाई की विदाई और विवाह के दबाव का कारण बन जाता है। क्या सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों ने कभी इन आंसुओं के वजन को महसूस किया है?

हम गर्व से खुद को 'विश्वगुरु' कहते हैं, लेकिन क्या एक गुरु अपने शिष्यों के साथ ऐसा छल होने दे सकता है? जिस देश में प्रतियोगिता का फैसला दशमलव के बाद वाले अंकों से होता हो, जहाँ 0.01 अंक भविष्य की दिशा तय करता हो, वहाँ पूरा का पूरा प्रश्नपत्र बिक जाना व्यवस्था की रीढ़ टूटने का प्रमाण है।

सबसे अधिक पीड़ादायक तो सत्ता की वह निर्लज्जता है, जहाँ जिम्मेदार मंत्री कैमरे के सामने 'जांच कमेटी' का लॉलीपॉप थमा देते हैं। इतिहास गवाह है कि ये कमेटियाँ अक्सर जन-आक्रोश को शांत करने और मुद्दे को 'ठंडे बस्ते' में डालने का एक घिनौना हथियार मात्र रही हैं।

कोटा: सपनों की राजधानी या मानसिक यातना गृह?

कोटा आज मेधा का केंद्र नहीं, बल्कि "मानसिक अवसाद" का गढ़ बनता जा रहा है। जब एक छात्र देखता है कि उसकी वर्षों की तपस्या को किसी रसूखदार के धनबल ने चंद घंटों में खरीद लिया, तो उसका तंत्र पर से भरोसा उठ जाता है। आत्महत्याएं केवल पढ़ाई के दबाव से नहीं होतीं, वे तब होती हैं जब बच्चे की आँखों के सामने 'न्याय' का गला घोंटा जाता है।

सिस्टम में बैठे ये 'सफेदपोश भेड़िए' चंद रुपयों के लिए देश के स्वास्थ्य और प्रशासनिक ढांचे की नींव में भ्रष्टाचार का ज़हर घोल रहे हैं। जो डॉक्टर या अधिकारी पैसे देकर कुर्सी तक पहुँचेगा, वह सेवा करेगा या अपने निवेश की वसूली?

भारतीय नौकरशाही की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ 'जवाबदेही' शून्य है। एक सरकारी सेवक चाहे कितना भी अक्षम या भ्रष्ट क्यों न हो, उसकी नौकरी और सुविधाएँ सुरक्षित हैं। वे बस अपनी जवाबदेही की गेंद को एक मेज से दूसरी मेज पर टालते रहते हैं, भले ही किसी छात्र का भविष्य गर्त में चला जाए।

आज मीडिया की भूमिका भी किसी से छिपी नहीं है। 'चौथा स्तंभ' अब टीआरपी के तराजू पर खबरों को तौलता है। जब तक हंगामा है, तब तक कैमरा है; जैसे ही शोर थमा, छात्रों का भविष्य फिर उसी अंधेरी कोठरी के हवाले कर दिया जाता है।

अब समय आ गया है कि सरकार से सीधे सवाल पूछे जाएं:

क्या सत्ता के सुख में डूबे हुक्मरान उन उंगलियों का दर्द समझ सकते हैं, जो पन्ने पलटते-पलटते घिस गई हैं?

क्या उन 'मोटी चमड़ी' वाले अफसरों को अंदाज़ा है कि एक पिता के लिए अपने बच्चे के टूटे सपनों को देखना, उसकी अर्थी उठाने जितना भारी होता है?

यदि आप देश के युवाओं को एक निष्पक्ष अवसर नहीं दे सकते, तो आपको उन्हें 'राष्ट्र का भविष्य' कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

यह समय खोखले आश्वासनों का नहीं, बल्कि तंत्र की 'सर्जरी' का है। अगर आज भ्रष्ट जड़ों को नहीं खोदा गया, तो कल भारत में 'प्रतिभा' की नहीं, बल्कि 'पैसे' की तूती बोलेगी। व्यवस्था को समझना होगा कि छात्रों का आक्रोश वह ज्वालामुखी है, जो यदि फटा तो सत्ता के सबसे ऊंचे शिखर भी राख हो जाएंगे।

साहब! बच्चों के सपनों को नीलाम करना बंद कीजिए, वरना इतिहास आपको 'सपनों के सौदागर' के रूप में याद रखेगा। याद रहे, युवाओं की इसी शक्ति ने पड़ोसी देशों में तख्तापलट की इबारत लिखी है। भारत की गरिमा बचाना अब आपके हाथों में है।

और अंत में मेरा एक सवाल जो मै आप पर छोड़ कर जा रहा हूं कि क्या इस तरह के परीक्षा के आयोजन में बैठे सदस्य भी तो कही इसी प्रक्रिया से तो नहीं आए है ? तभी तो उनको बच्चों का दर्द समझ में नहीं आता ।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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