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ध्यान रहे ये समय सोना नहीं लोहा खरीदने का है

क्योंकि जिनके पास लोहा है तुम्हारा सोना भी कुछ समय बाद उन्हीं के हाथ में होगा।*कल बहुत से मीम देखने को मिले।
इनमें से दो-तीन सवाल ऐसे थे जिनका मुझे लगा कि जवाब दिया जाना चाहिए।

जैसे एक सवाल जो सबसे कॉमन था
मोदी जी ने सोना खरीदने से मना कर दिया है, तो इससे करोड़ों सुनारों के व्यवसाय पर असर पड़ेगा।

दूसरा सवाल था
पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने को कहा जा रहा है, लेकिन खुद मोदी जी रैलियाँ करते हैं।

और इसी से जुड़ा एक सवाल था
विदेश यात्रा कम करने को बोल दिया और खुद विदेश जा रहे हैं?

देखिए, ब्राह्मण हूँ।
ज्ञान देना और ज्ञान लेना मेरी वृत्ति है।
आप बदले में मुझे गाली दे सकते हैं, अपशब्द कह सकते हैं, लेकिन मैं ज्ञान ही लूँगा। क्योंकि गाली देना मेरी वृत्ति नहीं है आपकी हो सकती है।

चलिए, शुरू करते हैं।

आपको पता है भारत में सालाना लगभग 700800 टन सोने की खपत होती है। दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खपत करने वाले देशों में भारत सबसे ऊपर है।

लेकिन कभी सोचा है कि आखिर ये 800 टन सोना जाता कहाँ है?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस 800 टन में से भारत खुद केवल लगभग 2 टन सोना पैदा करता है। बाकी 9095% सोना विदेशों से आयात किया जाता है और उसके बदले भारत को डॉलर चुकाने पड़ते हैं।

यानी मोटे तौर पर मानिए कि भारत में बिकने वाले हर 10 ग्राम सोने में से 9 ग्राम विदेश से आता है।

अब आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भारत में सोने की खपत चार हिस्सों में बंटी हुई है।

पहला लगभग 6570% सोना ज्वेलरी में जाता है। शादी-विवाह, दहेज, त्योहार और पारिवारिक बचत के रूप में इसकी खपत होती है।

दूसरा निवेश। लगभग 2025% सोना लोग निवेश के लिए खरीदते हैं। गोल्ड कॉइन, गोल्ड बार, डिजिटल गोल्ड, Gold ETF आदि इसी में आते हैं। जब लोगों को लगता है कि रुपये की कीमत गिरेगी, महंगाई बढ़ेगी या शेयर बाजार जोखिम में है, तब लोग सोना खरीदते हैं।

तीसरा उद्योग और टेक्नोलॉजी। करीब 58% सोना इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, मोबाइल, मेडिकल उपकरण और अंतरिक्ष तकनीक में इस्तेमाल होता है क्योंकि सोना बिजली का बेहतरीन conductor होता है और जल्दी खराब नहीं होता।

चौथा धार्मिक उपयोग। भारत में काफी सोना मंदिरों में दान और धार्मिक चढ़ावे के रूप में भी जाता है।

अगर 800 टन का मोटा हिसाब लगाएँ तो:

- 550600 टन गहनों में,
- 150180 टन निवेश में,
- 4050 टन उद्योग में,
- और 2030 टन धार्मिक व अन्य उपयोगों में जाता है।

अब सवाल आता है ये सोना खरीद कौन रहा है?

भारत में सोने की सबसे बड़ी खपत मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास में होती है। खासकर ग्रामीण समृद्ध किसान परिवार, छोटे व्यापारी और शादी-केंद्रित परिवारों में।

लेकिन सबसे ज्यादा संख्या में सोना कौन खरीदता है?
उत्तर है निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग।

क्योंकि भारत में हर शादी में कुछ न कुछ सोना लेना सामाजिक आवश्यकता जैसा माना जाता है। गाँवों में आज भी सोना सेविंग अकाउंट की तरह काम करता है। यही लोग 5 ग्राम, 10 ग्राम, छोटी चेन, चूड़ी, मंगलसूत्र जैसी चीजें खरीदते हैं।

और ध्यान रखिए मोदी जी ने इस खरीद को रोकने की अपील नहीं की है।
आपकी बेटी-बहन की शादी है, मंगलसूत्र खरीदिए, चूड़ी खरीदिए, चेन खरीदिए किसी ने नहीं रोका।

असल बात luxury demand की है।

सबसे भारी और महंगे गहने खरीदता है अमीर वर्ग बड़े बिजनेस परिवार, हाई नेटवर्थ लोग, बड़े शहरों का affluent class। ये लोग भारी bridal sets, designer jewellery और diamond-plus-gold combinations खरीदते हैं।

भारत में लंबे समय से लगभग 60% gold demand ग्रामीण भारत से आती रही है और यह demand सीधे शादी-ब्याह से जुड़ी हुई है। औसतन अधिकांश परिवार 2030 ग्राम के आसपास ही सोना खरीदते हैं।

इसलिए जो मित्र चिंता कर रहे हैं कि 5 करोड़ सुनार परिवार बेरोजगार हो जाएँगे, उनसे कहना चाहूँगा कि उनका बड़ा हिस्सा उसी ग्रामीण और मध्यमवर्गीय मांग से चलता है और यह मांग कभी खत्म नहीं होगी।

असल अपील उस वर्ग के लिए है जो शादियों में 300 ग्राम, 500 ग्राम, 700 ग्राम या आधा किलो सोना देता है।

अगर ऐसा वर्ग कुछ समय के लिए अपनी खरीद आधी भी कर दे, तो उनके जीवन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन देश के import bill और dollar outflow पर फर्क जरूर पड़ेगा।

अब आते हैं पेट्रोल-डीजल वाले सवाल पर।

कुछ मित्र कहते हैं
लोगों से पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील क्यों, जब खुद मोदी जी रैलियाँ करते हैं?

देखिए, यह बहुत छोटी सी गणित है।

अगर मोदी जी खुद अपने स्तर पर पेट्रोल-डीजल बचाएँ, तो कितना बचा पाएँगे?
हजार?
दो हजार?
दस हजार लीटर?

लेकिन अगर देश की 140 करोड़ जनता अपने स्तर पर रोज सिर्फ 50ml ईंधन भी बचाए, तो रोज कितनी बचत होगी कभी सोचा है?

आप रेड लाइट पर एक मिनट इंजन बंद कर दीजिए, दिन भर में 50100ml ईंधन बच सकता है।

व्यक्ति स्तर पर यह छोटी बचत है।
लेकिन 140 करोड़ लोगों की यही आदत राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ी बचत बन जाती है।

और उसका सीधा असर पड़ता है भारत के Forex Reserve पर।

सोना खरीदने के लिए, पेट्रोल-डीजल और crude oil आयात करने के लिए भारत को डॉलर चाहिए।
और आज दुनिया की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि भारत पर dollar outflow का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

इसी चिंता के चलते मोदी जी ने अपील की कि
फ्यूल बचाइए, गैर-ज़रूरी सोना कम खरीदिए।

अब एक और बात समझिए।

सरकारी स्तर पर fuel cut करना कोई साधारण बात नहीं होती। उसके पीछे सुरक्षा, प्रोटोकॉल और प्रशासनिक नियम होते हैं।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा में जो काफिला चलता है, उसमें कटौती कौन करेगा?
अगर कोई सुरक्षा चूक हो जाए तो जिम्मेदार कौन होगा?

और अगर सरकार अचानक आधिकारिक आदेश निकाल दे कि 10%, 20% या 30% फ्यूल कटौती करो, तो जनता में क्या संदेश जाएगा?

पैनिक शुरू होगा।
जमाखोरी शुरू होगी।
बाजार अस्थिर होने लगेंगे।

इतिहास गवाह है कि कई बार डर और अफवाहें असली संकट से भी बड़ा संकट पैदा कर देती हैं।

आप मोदी का विरोध कर सकते हैं, आलोचना कर सकते हैं, मजाक उड़ा सकते हैं यह आपका अधिकार है।
लेकिन हर फैसले के पीछे जो रणनीतिक सोच होती है, उसे समझने की कोशिश भी होनी चाहिए।

और अब आते हैं विदेश यात्राओं वाले मुद्दे पर।

प्रधानमंत्री ने कहा कि जो लोग घूमने-फिरने के लिए विदेश यात्राएँ करते हैं, वे एक साल के लिए उन्हें टाल दें।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि destination weddings को भी कुछ समय के लिए रोका जाए।

अब मुझे समझ नहीं आया कि आम जनता इसके लिए इतनी पैनिक क्यों कर रही है।

यह अपील आपके और हमारे लिए नहीं है।

विदेशों में छुट्टियाँ मनाने कौन जाता है?
वही वर्ग जिसकी सालाना आय 50 लाख, 1 करोड़ या उससे ऊपर होती है।

वो परिवार के साथ 10 दिन, 15 दिन या एक महीने के लिए विदेश घूमने जाता है।
जाते समय वह अपने रुपये सरकार को देकर बदले में डॉलर खरीदता है और फिर वही डॉलर विदेशों में खर्च करके लौट आता है।

सीधी भाषा में कहें तो यह Forex Reserve से सीधा dollar outflow है।

अब बात destination weddings की।

क्या हम और आप इटली, फ्रांस या यूरोप में जाकर शादी करते हैं?
नहीं।

यह उस affluent class के लिए है जो 2550 लोगों का पूरा समूह लेकर विदेश जाता है, करोड़ों रुपये के डॉलर खरीदता है और विदेशों में खर्च करके आता है।

ऐसे खर्च से भारत सरकार या भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधा क्या लाभ मिलता है?
उल्टा विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।

इसीलिए सरकार और प्रधानमंत्री ने उस वर्ग से अपील की है कि
देश की परिस्थितियों को देखते हुए कुछ समय के लिए संयम रखिए।

अगर यही पैसा भारत के भीतर पर्यटन, होटल, शादी उद्योग और घरेलू व्यापार में खर्च होगा, तो फायदा किसे होगा?
भारत की अर्थव्यवस्था को।
भारतीय रोजगार को।
भारतीय बाजार को।

और सबसे बड़ी बात Forex Reserve पर दबाव भी कम होगा।

अब रही बात प्रधानमंत्री जी की विदेश यात्राओं की।

प्रधानमंत्री किसी निजी छुट्टी, मौज-मस्ती या personal luxury के लिए विदेश नहीं जाते।
किसी भी देश का प्रधानमंत्री विदेश यात्राएँ रणनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और कूटनीतिक कारणों से करता है।

विपक्ष के narrative का शिकार मत बनिए कि प्रधानमंत्री घूमने जा रहे हैं।

आज दुनिया जिस आर्थिक और geopolitical दौर से गुजर रही है, उसमें ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक साझेदारियाँ सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं।

उदाहरण के लिए लोग अभी नार्वे यात्रा का मज़ाक उड़ा रहे हैं।
लेकिन क्या लोगों को पता है कि नार्वे दुनिया के बड़े gas producers में से एक है?

हाँ, वह उत्तरी यूरोप में है।
हाँ, वहाँ से transportation महँगा पड़ता है।

लेकिन अगर वैश्विक परिस्थितियों में भारत को कहीं से भी ऊर्जा सुरक्षा मिल सकती है, तो भारत को उसके लिए प्रयास करना ही पड़ेगा।

आज की दुनिया भावनाओं से नहीं, energy security और economic survival से चलती है।

कभी ठंडे दिमाग से सोचिए कि आप किस बात का मज़ाक उड़ा रहे हैं।

आलोचना करिए, सवाल पूछिए लोकतंत्र में यह जरूरी है।
लेकिन हर बात को केवल मज़ाक और propaganda की नजर से देखना भी सही नहीं है।

कई बार सत्य का आईना थोड़ा देर से दिखाई देता है, लेकिन जब दिखाई देता है तब मजाक उड़ाने वाला खुद अपना चेहरा आईने में नही देख पाता है ।

विचार जरूर कीजिए।

और आखिर में उन मित्रों के लिए जो कहते हैं
80 करोड़ लोगों को फ्री राशन देना बंद कर दो।

क्यों बंद कर दें?

आज भी देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके लिए मुफ्त राशन भूख और भोजन के बीच का फर्क है।

हाँ, यह सच है कि कई लोग ऐसे होंगे जो पात्र नहीं हैं फिर भी योजना का लाभ ले रहे हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिनको सच में जरूरत है, उनसे भी सब छीन लिया जाए।

भारत विरोधाभासों का देश है।

एक तरफ 3040 करोड़ लोग हैं जिन्होंने इस देश को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में खड़ा किया।
दूसरी तरफ करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जो आज भी सरकारी सहायता पर निर्भर हैं।

सरकार का काम किसी एक वर्ग को हटाना नहीं, बल्कि इन सबके बीच संतुलन बनाना है।

जो अमीर वर्ग है,वह देश की ताकत है।
लेकिन जो गरीब वर्ग है, वह देश की कमजोरी नहीं
वही इस देश का सबसे बड़ा बाजार और purchasing power भी है।

अच्छी सरकार वही होती है जो इन दोनों के बीच संतुलन बनाकर चले।

मेरे हिसाब से अधिकांश प्रश्नों के उत्तर मिल गए होंगे।
फिर भी कोई जिज्ञासा बाकी हो तो कमेंट में पूछ सकते हैं। कोशिश करूँगा उत्तर देने की।

हाँ, किसी को गाली देनी है या मजाक उड़ाना है, तो वह उसका अपना स्तर है
उसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।

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