सिर्फ़ सीनियर वकीलों के क्लाइंट को ही ज़मानत मिलती है': कहने वाले वकील को हाईकोर्ट से राहत, माफी स्वीकार की
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वकील को चेतावनी दी, जिसने यह दावा किया था कि कोर्ट सिर्फ़ उन आरोपियों को ज़मानत देता है, जिनका प्रतिनिधित्व सीनियर वकील करते हैं, न कि जूनियर वकील; कोर्ट ने उसकी माफ़ी स्वीकार की।
जस्टिस रामकुमार चौबे की बेंच ने यह टिप्पणी की:
"उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, जब मिस्टर सैनी ने अपनी माफ़ी मांगी तो यह कोर्ट उनके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का इच्छुक नहीं है। हालांकि, उन्हें चेतावनी दी जाती है कि वे न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता के प्रति सचेत रहें और इस कोर्ट के सामने अपनी बात रखते समय विशिष्ट और सावधान रहें।"
वकील सुदीप सिंह सैनी 6 मई को बेंच के सामने पेश हुए थे और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अपने क्लाइंट के लिए ज़मानत मांग रहे थे। उस समय उन्होंने कहा कि कोर्ट ने उन आरोपियों को ज़मानत दी, जिनका प्रतिनिधित्व सीनियर वकीलों ने किया था। मौजूदा आवेदक को सिर्फ़ इसलिए वैसी ही राहत न देना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसका वकील जूनियर वकील है।
कोर्ट ने उनकी बातों को पहली नज़र में अपमानजनक पाया और यह भी पाया कि सैनी आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत पेश नहीं कर पाए। इसलिए कोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया था कि वे अपने दावों को पुष्ट करने के लिए, कथित तौर पर ऐसे ही मामलों में पारित आदेशों की एक प्रति रिकॉर्ड पर रखें।
इसके बाद सैनी ने कहा कि उन्हें न तो किसी ऐसे आदेश की जानकारी है और न ही उनके पास ऐसा कोई आदेश है, जो कोर्ट ने पारित किया हो, जिसमें किसी सीनियर वकील या किसी अन्य वकील के क्लाइंट को ऐसे ही किसी मामले में ज़मानत दी गई हो।
वकील ने आगे दावा किया कि उनके द्वारा लगाए गए आरोप 19 फरवरी, 2026 को एक समन्वय बेंच द्वारा MCrC No.6131/2026 (रामप्रसाद विश्या बनाम मध्य प्रदेश राज्य) मामले में पारित आदेश पर आधारित थे।
बता दें, यह मामला आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत ज़मानत दिए जाने से संबंधित था, जिसमें कोर्ट ने यह पाया कि अपीलकर्ता ने जाँच में सहयोग किया था और ट्रायल कोर्ट ने उसे अग्रिम ज़मानत दी थी।
इस प्रकार, बेंच ने यह माना,
"इससे पहले, मिस्टर सैनी द्वारा कोर्ट में दिया गया बयान एक बाहरी विचार माना गया, जो इस कोर्ट के न्यायिक कामकाज पर सवाल उठाता था। पहली नज़र में यह इस कोर्ट की गरिमा के लिए अपमानजनक और प्रकृति में अवमाननापूर्ण प्रतीत होता था।"
इसलिए कोर्ट ने सैनी से यह स्पष्टीकरण मांगा कि उनके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए, जिस पर सैनी ने माफ़ी मांग ली। अतः, न्यायालय ने उनकी क्षमा स्वीकार कर ली, किंतु उन्हें सचेत किया कि भविष्य में अपनी दलीलें प्रस्तुत करते समय वे न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता का ध्यान रखें।