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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका:-

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू धर्म की व्यापक और समावेशी प्रकृति को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हिंदू धर्म केवल मंदिरों में पूजा-अर्चना या जटिल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली अथवा वे ऑफ लाइफ के रूप में देखा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी सबरीमला से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसने देशभर में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि किसी व्यक्ति के हिंदू होने को सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिदिन मंदिर जाए या विस्तृत धार्मिक कर्मकांडों का पालन करे। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म की पहचान उसके बाहरी प्रदर्शन से अधिक व्यक्ति की आस्था, जीवन मूल्यों और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जुड़ी हुई है। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान एक अत्यंत संवेदनशील और प्रतीकात्मक टिप्पणी करते हुए कहा, यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी में भी एक दीपक जलाता है, तो वही उसकी धार्मिक आस्था को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है। अदालत की इस टिप्पणी को हिंदू धर्म की व्यक्तिगत, उदार और आत्मिक प्रकृति के रूप में देखा जा रहा है। यह विचार इस बात को रेखांकित करता है कि हिंदू धर्म में आस्था का स्वरूप अत्यंत व्यापक और व्यक्तिगत है, जो किसी एक निश्चित पद्धति या अनिवार्य धार्मिक व्यवहार तक सीमित नहीं है।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने भी हिंदू धर्म की विविधता और लचीलेपन पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा में अनेक प्रकार की मान्यताएं, उपासना पद्धतियां और जीवन दर्शन समाहित हैं, जो इसे विश्व की सबसे समावेशी आध्यात्मिक परंपराओं में से एक बनाते हैं। अदालत की टिप्पणियों में यह भी स्पष्ट रूप से झलकता है कि भारतीय संस्कृति में धर्म को केवल औपचारिक अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों, नैतिकता और आचरण से भी जोड़ा जाता है। कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां भारतीय संविधान की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता की भावना को भी मजबूत करती हैं। कई लोगों ने इसे हिंदू दर्शन की उस मूल अवधारणा की पुनर्पुष्टि बताया है, जिसमें सहिष्णुता, विविधता और व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वतंत्रता को विशेष महत्व दिया गया है। उल्लेखनीय है कि हिंदुत्व और हिंदू धर्म को जीवन पद्धति के रूप में देखने की अवधारणा पर सुप्रीम कोर्ट पूर्व में भी विभिन्न मामलों में टिप्पणी कर चुका है। हालांकि, वर्तमान सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों ने एक बार फिर इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक वर्गों में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। अनेक लोगों ने इसे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उदार और मानवीय सोच का प्रतिबिंब बताया है, जबकि कुछ इसे धर्म और आस्था की आधुनिक व्याख्या के रूप में देख रहे हैं।

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