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अभिभावक का उपदेश और व्यवस्था की विलासिता : पटोरी से उठी सुलगती आवाज ।

भारत की जनता स्वभाव से भावुक और बड़ी भोली है। यहाँ प्रेम और विश्वास की पराकाष्ठा यह है कि जब देश का मुखिया (अभिभावक) कुछ कहता है, तो लोग उसे तर्क की कसौटी पर कसने के बजाय आस्था के साथ स्वीकार कर लेते हैं। चाहे वह नोटबंदी की कतारों में खड़ा होना हो, थाली बजाना हो या अब देशहित के नाम पर अपनी बुनियादी जरूरतों (सोना, पेट्रोल-डीजल) में कटौती करना हो। पटोरी के बाजार से लेकर दिल्ली के गलियारों तक, जनता तो अपनी 'ईमानदारी' निभा रही है, लेकिन क्या व्यवस्था भी उतनी ही ईमानदार है?

आजकल सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतारों और चकाचौंध को 'तरक्की' का पैमाना मान लिया गया है। भारतीय मीडिया जिस खुशहाली की तस्वीर पेश कर रहा है, वह असल में एक 'ईएमआई (EMI) इकोनॉमी' पर टिकी है। मिडिल क्लास कहलाने वाला व्यक्ति आज अंदर से खोखला हो चुका है। पटोरी जैसे छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों की हकीकत यह है कि बाहर से वे 'ऑल इज वेल' दिखते हैं, लेकिन घर में अचानक आई कोई चिकित्सीय आपदा या विपत्ति उनके खाते का सच उजागर कर देती है। जिनके पास 25 हजार रुपये की तत्काल बचत नहीं, वे भी व्यवस्था के द्वारा परोसे गए 'फील गुड' के नशे में जीने को मजबूर हैं।

"किताबों में दर्ज है कि देश तरक्की कर रहा है,जरा बाहर निकलकर पूछो, कितनों का घर कर्ज पर चल रहा है।"

हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने जनता से अपील की कि देशहित में पेट्रोल-डीजल और सोने का उपयोग कम करें। जनता ने इसे भी मान लियाबाजारों में सन्नाटा पसरा, व्यापार प्रभावित हुआ। लेकिन सवाल यहाँ चुभता है: "जब घर का मुखिया बच्चों को संयम का पाठ पढ़ा रहा हो, तो क्या उसे खुद विलासिता में डूबे रहना शोभा देता है?"

एक तरफ आम आदमी को अपनी छोटी-सी बाइक के लिए ईंधन बचाने को कहा जाता है, तो दूसरी तरफ नेताओं और मंत्रियों के पीछे दौड़ता गाड़ियों का विशाल काफिला उसी जनता का मुँह चिढ़ाता है। सरकारी खजाने का यह फिजूलखर्च उस जनता के गाल पर तमाचा है, जो खुद तंगी में रहकर 'राष्ट्र निर्माण' का बोझ ढो रही है।

विकास के दावों की पोल खोलते प्रोजेक्ट्स की बात करें, तो दरभंगा एम्स (AIIMS) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बिना बाउंड्री वॉल के करोड़ों का 'गेट' खड़ा कर देना किसी मजाक से कम नहीं लगता। जिस प्रदेश के युवा पलायन के दंश को झेल रहे हों, जहाँ बेरोजगारी की मार से दूसरे राज्यों में लोग लाठियां खा रहे हों और हीन दृष्टि से देखे जा रहे हों, वहाँ प्रधानमंत्री का चुनावी मंच से "अरवा-उसना चावल" की बात करना हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार को उद्योगों की जरूरत थी, रोजगार के अवसर चाहिए थे, न कि राशन की श्रेणियों का चुनावी वर्गीकरण।

किसी भी घर का संस्कार उसके मुखिया से तय होता है। अगर घर का बड़ा सदस्य त्याग और शुचिता का दिखावा करे लेकिन भीतर से भोग-विलास में लिप्त हो, तो वह भावी पीढ़ी का भरोसा खो देता है। यही बात देश पर लागू होती है। देश का प्रधानमंत्री सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि देश का 'गार्जियन' होता है।

पटोरी की सड़कों पर मशाल लेकर निकलने वाला युवा हो या खेती में पसीना बहाता किसान, वे अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। वे पेट्रोल भी कम जला लेंगे और खुशियों की चाहत में सोना भी कम खरीदेंगे, बशर्ते उन्हें यह विश्वास हो कि उनके द्वारा बचाया गया एक-एक पैसा मंत्रियों की सुख-सुविधा पर नहीं, बल्कि देश के भविष्य पर खर्च होगा।

सत्ता को यह समझना होगा कि जनता की 'भोलभाली आस्था' को उसकी कमजोरी न समझा जाए। न्याय और विकास केवल भाषणों और विज्ञापनों में नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब और उसकी आत्मा के सुकून में दिखना चाहिए। जब तक व्यवस्था खुद में सुधार नहीं लाएगी, तब तक जनता से त्याग की उम्मीद करना केवल एक छलावा ही कहलाएगा।

और अंत में मेरा मानना है कि -----
"पटोरी को सड़कों से उठाती आवाजें केवल व्यवस्था के खिलाफ नहीं बल्कि उस खोखली व्यवस्था को एक चेतावनी है जो जनता की आस्था को उनकी कमजोरी समझ बैठी है ।अगर गार्जियन ( अभिभावक ) की थाली सोने की हो और बच्चों को संयम का पाठ पढ़ाया जाय , तो विद्रोह का जन्म होना निश्चित है ।"

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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