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दूर की सोच

कल्पना कीजिए,समुद्र के ऊपर तूफान से पहले की वह भारी खामोशी, जो किसी बड़ी उथल-पुथल का संकेत दे रही हो।
जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधान 24 घंटे में दो बार 'संयम' की गुहार लगाए, तो समझ लीजिए कि बात सिर्फ तेल की चंद बूंदों की नहीं है। यह उस 'आर्थिक महायुद्ध' की तैयारी है जिसकी धमक अभी आम कानों तक नहीं पहुँची है।
वडोदरा की धरती से उठी यह अपील दरअसल भारत के 'इकोनॉमिक डिफेंस सिस्टम' को एक्टिवेट करने का बटन है।
आखिर ऐसा क्यों?
प्रधानमंत्री की नजर पेट्रोल पंपों पर नहीं, बल्कि रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार पर है। भारत अपना तेल 'डॉलर' देकर खरीदता है। पश्चिम एशिया में तनाव का मतलब है डॉलर का महंगा होना।
इसे ऐसे समझिए कि आपके घर का एक 'खास बटुआ' है जिससे आप बाहर से जरूरी दवाइयां मंगाते हैं। अगर आप सारा पैसा अभी महंगे पेट्रोल और सोने में फूंक देंगे, तो कल को मुसीबत पड़ने पर बटुआ खाली मिलेगा। 'सोना न खरीदने' की अपील इसी बटुए (विदेशी मुद्रा) को बचाने की एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' है।
दुनिया के तेल का गला 'Strait of Hormuz' में दबा है। अगर यहाँ एक भी मिसाइल गिरी, तो दुनिया की तेल सप्लाई चेन टूट जाएगी।. मान लीजिए आपके मोहल्ले की वह इकलौती दुकान बंद होने वाली है जहाँ से पूरे मोहल्ले का राशन आता है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि "तेल कम जलाओ" और "कार पूल करो", ताकि जो राशन (तेल) हमारे पास पहले से जमा है, वह लंबे समय तक चले और हम मुश्किल वक्त के लिए तैयार रहें।
'वर्क फ्रॉम होम' का सुझाव भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक 'स्ट्रेस टेस्ट' है। यह देखना है कि क्या संकट के समय देश की उत्पादकता सड़कों के बजाय इंटरनेट पर सुरक्षित रह सकती है?
यह एक तरह की 'तूफान से पहले की ड्रिल' है। अगर कल को बाहर हालात ज्यादा बिगड़ते हैं, तो क्या हमारा काम और रोजगार घर बैठे सुरक्षित रह सकता है? यह खुद को आत्मनिर्भर बनाने का अभ्यास है।
जब वैश्विक व्यापार मार्ग असुरक्षित होते हैं, तो 'ग्लोबलाइजेशन' फेल हो जाता है। ऐसी स्थिति में केवल वही देश बचेंगे जो स्थानीय स्तर पर मजबूत होंगे।
जब मोहल्ले में लड़ाई हो, तो बाहर की दुकानों के भरोसे रहना जोखिम भरा है। अपने घर (देश) में बनी चीजों का इस्तेमाल करना अब केवल देशभक्ति नहीं, बल्कि 'जिंदा रहने की जरूरत' बन गई है।
यह अपील किसी सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि एक उभरती हुई महाशक्ति की 'रणनीतिक दूरदर्शिता' है।
प्रधानमंत्री जानते हैं कि भविष्य में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आपकी जेब और रसोई के बजट पर लड़े जाएंगे। आज जब पश्चिम एशिया का आसमान बारूद की गंध से भारी है, तब भारत अपने नागरिकों को एक 'उपभोक्ता' से बदलकर एक 'आर्थिक योद्धा' में तब्दील कर रहा है।
यह उस अनुशासन का आह्वान है, जहाँ एक आम नागरिक द्वारा बचाया गया पेट्रोल का एक कतरा और घर की तिजोरी में न खरीदा गया सोने का एक टुकड़ा, देश की साख के लिए कवच बनेगा। यह वक्त सुख-सुविधाओं के विस्तार का नहीं, बल्कि राष्ट्र की जड़ों को इतना गहरा करने का है कि वैश्विक अस्थिरता की कोई भी आंधी Iron हिला न सके।
हमे उम्मीद है जब दुनिया युद्ध की आग में ईंधन तलाश रही होगी, तब भारत अपने संयम और समझदारी से आत्मनिर्भरता का नया इतिहास लिख रहा होगा

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