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डर की राजनीति बनाम भारत का सामाजिक सच

मुंबई: डॉ. एम. एस. बाली ने सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में ‘‘हिंदू खतरे में है’’ के कथन की समीक्षा की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या यह खतरा वास्तविक है या एक सुनियोजित भय जो जनमानस में बैठाया जा रहा है। देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी के बीच इस अवधारणा पर विचार करते हुए डॉ. बाली ने बताया कि भय का निर्माण सत्ता और प्रभाव बनाए रखने का एक माध्यम रहा है, जो नागरिकों को भावनाओं के आधार पर निर्णय लेने को प्रेरित करता है।

डॉ. बाली ने यह भी कहा कि धार्मिक पहचान को प्रमुखता देने से लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती मिलती है और शिक्षित वर्ग भी बिना गहराई से विचार किए इस विमर्श का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने राजनीतिक दलों द्वारा भावनात्मक मुद्दों के उपयोग पर भी चिंता जताई और कहा कि वास्तविक चुनौती समाज में बढ़ती दूरी, अविश्वास और संवादहीनता है। डॉ. बाली ने भारत की विविधता और सहअस्तित्व की महत्ता को रेखांकित करते हुए सामाजिक एकता और विवेक के मार्ग अपनाने का आह्वान किया है।

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