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बंदूक छोड़ी, कलम उठाई: एक फौजी की वह खोज, जिसने इतिहास के पन्नों से गायब 745 बैरागी शहीदों का सच खोल दिया!

बंदूक छोड़ी, कलम उठाई: एक फौजी की वह खोज, जिसने इतिहास के पन्नों से गायब 745 बैरागी शहीदों का सच खोल दिया!
लेखक: नरेश दास वैष्णव 'निंबार्क'
(पूर्व नायब सूबेदार, भारतीय सेना)
भूमिका: महलों की चौखट से परे का सच
इतिहास अक्सर महलों की चौखट पर जाकर दम तोड़ देता है, लेकिन सच आज भी उन मठों और अखाड़ों की धूल में सुरक्षित है जहाँ 'माला' और 'भाला' एक साथ तपस्या करते थे। एक सैनिक के रूप में मैंने 24 वर्षों तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएँ दीं और सीमाओं की रक्षा की। उस समय मेरा शस्त्र 'बंदूक' थी। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद, ग्वालियर की उस पवित्र माटी ने मुझे एक नया शस्त्र थमा दिया 'कलम'।
मेरी यह यात्रा पुस्तकालयों के बंद कमरों से नहीं, बल्कि उस दर्द और उपेक्षा से शुरू हुई जिसे मैंने ग्वालियर के 'बैरागी द्वारे' (महंत गंगादास की शाला) में महसूस किया। यह लेख उस अनकहे बलिदान की गाथा है जिसे मुख्यधारा के इतिहास ने हाशिए पर धकेल दिया।
ग्वालियर का 'बैरागी द्वारा': जहाँ इतिहास आज भी सिसक रहा है
जब मैं अपनी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव के साथ ग्वालियर के उस ऐतिहासिक स्थान पर पहुँचा, तो जो दृश्य देखा उसने हम दोनों को भीतर तक झकझोर दिया। निर्मला जी मेरी इस पूरी खोजपूर्ण यात्रा में छाया बनकर साथ रहीं। वह स्थान, जो कभी 1500 सशस्त्र नागा साधुओं और बैरागी सैनिकों की छावनी था, जहाँ राष्ट्र-रक्षा के लिए तोपों और 'बाला-बरछी' का जखीरा तैयार रहता था, आज अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है।
18 जून, 1858: वह रक्त-रंजित स्वर्णिम पन्ना
इतिहास का वह दिन याद कीजिए जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेते हुए घायल अवस्था में इसी बैरागी छावनी में लाई गई थीं। उनके गुरु, महान क्रांतिकारी संत महंत गंगादास जी वहाँ के पीठाधीश्वर थे। रानी के अंतिम शब्द थे "गुरुदेव! ये गोरे फिरंगी मेरे शरीर को हाथ न लगा सकें।"
महंत जी ने विलंब नहीं किया। उन्होंने अपने 1500 बैरागी सैनिकों को आदेश दिया। उस समय जब साधारण जनता के पास आत्मरक्षा के लिए चाकू तक नहीं था, हम वैष्णव बैरागियों के पास अपनी 'तोपें' थीं। आज भी वे तोपें वहाँ सुरक्षित हैं और हर विश्वकर्मा दिवस पर उनकी गर्जना सुनी जा सकती है। उन जांबाज संतों ने रानी की देह की रक्षा के लिए वह अभेद्य घेरा बनाया कि अंग्रेजों की विशाल सेना भी उसे भेद न सकी। अंततः, रानी का अंतिम संस्कार उसी परिसर में बाबा गंगादास की कुटिया की घास-फूस से किया गया।
745 शहीदों का मौन बलिदान
उस एक दिन में 745 बैरागी योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। वे न तो किसी राजसी वैभव के भूखे थे और न ही उनके पीछे रोने वाला कोई परिवार था। वे विरक्त थे, जिनका घर भी राष्ट्र था और परिवार भी राष्ट्र।
विश्व पटल पर सनातन का शंखनाद: बंदूक से कलम तक का सफर
ग्वालियर की उस उपेक्षा ने मुझे सिखाया कि वैचारिक और ऐतिहासिक दुश्मन को रोकने के लिए 'कलम' उठाना अनिवार्य है। जब से मैंने यह मार्ग चुना है, मेरा ध्येय केवल लेखन नहीं बल्कि सत्य की पुनर्स्थापना रहा है।
आज मुझे यह बताते हुए गर्व और संतोष की अनुभूति होती है कि मेरी लेखनी के माध्यम से:
3 हिंदी पुस्तकें और 7 अंग्रेजी पुस्तकें वर्तमान में पूरी दुनिया में 'सनातन वैष्णव बैरागी' परंपरा का परचम लहरा रही हैं।
इन पुस्तकों में "Sanatan Vaishnav Bairagi: Warriors and Soldiers" और "Nimbarka Sampradaya: Sanatan Vaishnav Bairagi Tradition" जैसे शोधपूर्ण कार्य शामिल हैं, जो वैश्विक स्तर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पाठकों तक पहुँच रहे हैं।
यह केवल मेरा प्रयास नहीं, बल्कि उन 745 शहीदों का आशीर्वाद है कि आज दुनिया भर के शोधकर्ता और पाठक हमारी इस महान योद्धा परंपरा के वास्तविक स्वरूप को पहचान रहे हैं।
अखाड़ों की सैन्य संरचना और 'नागा' कमांडो
एक पूर्व सैनिक होने के नाते, जब मैंने अखाड़ों के भीतर की दुनिया को देखा, तो मुझे प्राचीन भारतीय गुरिल्ला युद्ध पद्धति की झलक मिली। अखाड़ों में 'पटेबाजी', 'लाठी-संचालन' और 'मल्लयुद्ध' की वे तकनीकें आज भी जीवित हैं।
श्री महंत: ये एक सेनापति की भांति अपने खालसों और जत्थों का संचालन करते हैं।
नागा योद्धा: ये वास्तव में सनातन धर्म के 'कमांडो' हैं। संसार से विरक्त होकर भी इनकी आँखें सदैव धर्म के शत्रुओं पर सजग रहती हैं।
1882 का षड्यंत्र: ब्रिटिश हुकूमत ने 'बैरागी' को एक संकुचित जाति का जामा पहनाया ताकि उनकी 'योद्धा' पहचान को मिटाया जा सके। लेकिन सच यह है कि बैरागी कोई जाति नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक और सैन्य क्रांति' थी।
निष्कर्ष: यश नहीं, हक की लड़ाई
आज इस आयु में मेरा ध्येय यश पाना नहीं, बल्कि उन 'बेनाम' योद्धाओं को उनका हक दिलाना है। मेरी हर पुस्तक, हर लेख और हर व्याख्यान उन शहीदों को समर्पित है जिन्होंने अपनी झोपड़ी और नाम तक की चिंता नहीं की, पर देश के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच छोड़ गए।
लेखक परिचय:
नरेश दास वैष्णव 'निंबार्क' एक लेखक, स्वतंत्र शोधकर्ता और इतिहासकार हैं। वे भारतीय सेना से सेवानिवृत्त नायब सूबेदार हैं और वर्तमान में हरियाणा के सोनीपत जिले के रामनगर गाँव में निवास करते हैं। वे 'सनातन भारत - नया सवेरा' डिजिटल पत्रिका के संपादक भी हैं।
संपर्क एवं शोध कार्य के लिए:
वेबसाइट: www.nareshswaminimbark.in

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