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वर्दी का दाग: 1 लाख की घूस, कॉक्ड पिस्टल और बेनकाब हुई पुलिस की असली सूरत, पटना के जानीपुर थाने का एडिशनल SHO संजय सिंह निगरानी के जाल में,

विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

पटना : "जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, जब वर्दी कानून का नहीं लालच का औज़ार बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?"
खाकी पर दाग: जब रक्षक ने तानी सरकारी पिस्टल, तो कांप उठी कानून की रूह!

राजधानी के जानीपुर थाने से आई एक खबर ने पूरे बिहार के पुलिस महकमे को शर्मसार कर दिया है।
एक तरफ बिहार सरकार 'जीरो टॉलरेंस' का नारा देती है, तो दूसरी तरफ जानीपुर थाने के एडिशनल SHO संजय सिंह जैसे अधिकारी कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं।
1 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए इस अधिकारी ने जो किया, वह किसी अपराधी से कम नहीं था।

घटना का पूरा सच
बिहार की राजधानी के जानीपुर थाने का एडिशनल SHO यानी वो अधिकारी जिसे कानून का रखवाला माना जाता है बुधवार को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (NIB) के जाल में फंस गया।
एडिशनल SHO संजय सिंह को उस वक्त रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया जब वे गाजाचक मोहम्मदपुर पंचायत के कोरियावां प्लॉट पर "सर्वे" के बहाने गए थे और वहां पहुंचकर पीड़ित कौशल से एक लाख रुपए नकद वसूल रहे थे।

यह पैसा किसलिए था?
एक जमीन विवाद के मामले का निपटारा करने के लिए। यानी कानून का दरवाज़ा खुलवाने की कीमत एक लाख रुपए।

शिकायत से गिरफ्तारी तक पूरी कहानी,
कौशल एक साधारण नागरिक हैं जो जमीन विवाद की समस्या लेकर थाने पहुंचे।
वहाँ उनसे "मामला सुलझाने" के बदले पाँच लाख रुपए माँगे गए।
कौशल के पास इतना पैसा नहीं था पर दर्द था, और हिम्मत भी।
बातचीत के बाद रकम दो लाख पर आई।
लेकिन कौशल ने घूस देने की जगह निगरानी विभाग में शिकायत दर्ज कराई।

निगरानी ने जाल बिछाया।
संजय सिंह बुधवार को "सर्वे" के बहाने कोरियावां प्लॉट पहुंचे। जैसे ही उन्होंने एक लाख रुपए अपने हाथ में लिए निगरानी की टीम ने उन्हें दबोच लिया।
लेकिन यहाँ कहानी और खतरनाक मोड़ लेती है।

पुल-कोट:
"पकड़े जाने के बाद संजय सिंह ने अपनी सरकारी पिस्टल कॉक कर ली निगरानी ASI रवि कुमार ने जान जोखिम में डालकर उनका हाथ थाम लिया। इस जद्दोजहद में ASI रवि कुमार घायल हो गए।"

वर्दी और हथियार का दुरुपयोग सवाल उठने चाहिए,
एक पुलिस अधिकारी जो घूस लेते पकड़ा गया उसने सरकारी पिस्टल कॉक की।
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, यह सरकारी हथियार से निगरानी दल को धमकाने का प्रयास था।
यह राज्य के खिलाफ विद्रोह की भाषा है।
क्या यह पिस्टल जनता की सुरक्षा के लिए दी गई थी?
या अपराध को ढकने के लिए?

निगरानी ASI रवि कुमार ने अपनी जान की परवाह न करते हुए हाथ थाम लिया और इस खतरनाक स्थिति को संभाला। वे बिहार के असली नायक हैं चोट खाकर भी अपने दायित्व से नहीं हटे।

यह कोई अकेला मामला नहीं,
बिहार में पुलिस भ्रष्टाचार के ये मामले पैटर्न बन चुके हैं।
कदमकुआं थाने के एडिशनल SHO अर्जुन यादव को हाल ही में 7,000 की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया।
सारण में SI मोहित मोहन को 9,000 में।
सिवान में SI कन्हैया सिंह को 40,000 में।
यह सिलसिला बताता है कि थानों में "रेट कार्ड" चल रहा है जमीन विवाद से लेकर मुकदमे बंद करने तक।

सवाल यह है: जब बार-बार पुलिसकर्मी पकड़े जाते हैं तो विभाग के भीतर जवाबदेही कब तय होगी?

जीरो टॉलरेंस की असलियत क्या है?
सरकार "जीरो टॉलरेंस" का नारा देती है। निगरानी विभाग कार्रवाई भी करता है। लेकिन जब तक:
पुलिस विभाग के भीतर आंतरिक जवाबदेही नहीं बनती,
दोषी अधिकारियों की सेवा तत्काल समाप्त नहीं होती,
पीड़ित शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती,
तब तक यह नारा सिर्फ अखबारों की सुर्खी बनकर रह जाएगा।

कौशल जैसे साहसी नागरिक ने घूस न देकर शिकायत की यह असाधारण है।
लेकिन क्या हर पीड़ित के पास इतनी हिम्मत और जागरूकता है?
ज़्यादातर लोग चुपचाप पैसा देते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि शिकायत करने पर उनका मामला और उलझेगा।

वीडियो सबूत जो मिटाया नहीं जा सकता
घूस लेते संजय सिंह का वीडियो सामने आ गया है।
यह डिजिटल युग का सबसे बड़ा हथियार है भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ। अब न इनकार संभव है, न बचाव।

यह वीडियो सिर्फ एक अधिकारी का नहीं पूरी उस व्यवस्था का आईना है जिसमें वर्दी, ताकत और हथियार सब जनता के विरुद्ध इस्तेमाल हो सकते हैं।

बिहार पुलिस में ऐसे अधिकारी भी हैं जो ईमानदारी से काम करते हैं। ASI रवि कुमार इसका प्रमाण हैं। लेकिन संजय सिंह जैसे अधिकारी उन सभी की मेहनत और छवि पर कालिख पोत देते हैं। पुलिस सुधार अब विकल्प नहीं अनिवार्यता है।

मांगें और जवाबदेही,
संजय सिंह को तत्काल निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कठोर कार्रवाई हो।
ASI रवि कुमार को राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया जाए और उनके इलाज की पूरी जिम्मेदारी सरकार ले।
पीड़ित कौशल की सुरक्षा सुनिश्चित हो उन्हें किसी प्रकार का दबाव या प्रतिशोध न झेलना पड़े।
जानीपुर थाने की पूरी कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जाँच कराई जाए।
हथियार के दुरुपयोग के लिए अलग से मुकदमा दर्ज हो यह सामान्य भ्रष्टाचार से गंभीर मामला है।
अंत में जनता से एक बात,
कौशल ने जो किया, वह हम सभी को सीखना होगा।
घूस मत दो शिकायत करो।
निगरानी का टोल-फ्री नंबर 1064 है। यही नंबर भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।
जब तक एक-एक कौशल खड़ा होता रहेगा संजय सिंह जैसे लोग पकड़े जाते रहेंगे।

वर्दी की इज्ज़त उन्हें बचाती है जो उसके काबिल हैं। जो नहीं हैं उनके लिए निगरानी का जाल है।

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