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अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए संकट में प्रधानमंत्री की अपील पर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का वक्तव्य

अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए संकट में प्रधानमंत्री की अपील पर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का वक्तव्य

सवा दो महीनों तक आर्थिक मजबूती का गैर-जरूरी दिखावा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध के कारण आईं आर्थिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए भारतवासियों से सात-सूत्री अपील की है। उन्होंने कहा है,
ऊर्जा बचाने के लिए उन्हें वर्क फ्रॉम होम को तरजीह दी जाए,
सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर पेट्रोल- डीजल की खपत घटाई जाए,
लोग खाना पकाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती करें,
विदेशी मुद्रा खर्च ना हो, इसके लिए साल भर लोग सोना ना खरीदें,
स्वदेशी उत्पादों का ज्यादा इस्तेमाल किया जाए,
विदेश यात्रा से बचा जाए, और
रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल घटाने के लिए किसान कुदरती खेती की ओर जाएं।

साफ तौर ये बातें ऊर्जा, डॉलर, और उर्वरकों की किल्लत और आने वाले दिनों में इस संकट के बढ़ने का संकेत देत हैं। ये बात सही है कि ईरान युद्ध ने विश्व ऊर्जा बाजार के स्वरूप को बदल दिया है। इसकी मार उन तमाम देशों पर पड़ी है, जिनके पास अपना ऊर्जा स्रोत नहीं है और अच्छे दौर में रणनीतिक भंडार बना लेने की बात जिनके दिमाग में नहीं आई।

सवाल है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने तेल भंडार बनाने की योजना क्यों नहीं बनाई? तेल और गैस के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पूरी तरह निर्भर होने के बावजूद अमेरिका के आदेश पर केंद्र सरकार ने पहले ईरान और फिर रूस से रियायती दर पर मिल रहे तेल को खरीदना क्यों बंद किया? इसी बीच विदेशी निवेशकों की भारत से पैसा निकालने के तेज होती गई रफ्तार और रुपये की कीमत में आई भारी गिरावट ने संकट और बढ़ा दिया है।

मगर यह रुझान ईरान युद्ध शुरू होने से पहले से देखने को मिल रहा था। इसकी एक वजह डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत लगातार गिरावट है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए यहां पैसा लगाए रखना नुकसान का सौदा बन गया है। रुपये की कीमत में गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की पहले से कमजोर होती गई हालत का परिणाम है।

आर्थिक संकट के बारे में प्रधानमंत्री के भाषणों से देश में फैले भय के बीच केंद्र ने सोना, चांदी और अन्य कीमती धातुओं के आयात पर शुल्क बढ़ा कर 15 (10 प्रतिशत कस्टम+ 5 फीसदी कृषि एवं विकास उपकर) कर दिया है। सोने का आयात विदेशी मुद्रा भंडार में सेंध लगने का बड़ा कारण बना रहा है। मगर कारणों की पड़ताल करें, तो आयात बढ़ने की सीधी जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी सरकार पर जाएगी। केंद्र ने मई 2022 में यूएई के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर अमल शुरू किया, जिसके तहत वहां से टैरिफ रेट कोटा सिस्टम के तहत स्वर्ण आयात पर शुल्क सामान्य छह प्रतिशत से एक प्रतिशत कम (यानी पांच प्रतिशत) कर दिया गया। इसके पहले (2022 में) भारत के कुल स्वर्ण आयात में यूएई का हिस्सा 7.9 प्रतिशत (2.9 बिलियन डॉलर) था, जो पिछले साल 28 प्रतिशत (16.5 बिलियन डॉलर) हो गया। इस बीच पिछले साल सोने के भाव में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। इससे सोना आम मध्य वर्ग की पहुंच से बाहर हो गया। जबकि अति धनी लोग खरीदारी करते रहे, जिससे डॉलर बाहर गया।
प्रधानमंत्री ने मध्य वर्ग से विदेश जाने से बचने का आह्वान भी किया है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या में पिछले दो साल में गिरावट आई है। फिर भी डॉलर बाहर जाने में बढ़ोतरी हुई, तो उसका कारण अति धनी व्यक्तियों का विदेश में चल और अचल संपत्ति में निवेश है। अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 तक 26.4 बिलियन डॉलर का निवेश इन लोगों ने विदेश में किया। ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि मोदी सरकार ने लिबरलाइज्ड रेमिटैंस स्कीम, टैक्स राहत, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस आदि के नाम पर विदेशी कर्मियों के लिए खुद इसका मार्ग प्रशस्त किया।

पश्चिम एशिया से घटे आयात के कारण उर्वरक में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स का अभाव हो गया है, जिससे खाद्य संकट की आशंकाएं गहराई हैं। इसका समाधान ढूंढने और दूसरे क्षेत्रों से उर्वरकों का इंतजाम करने के बजाय मोदी ने किसानों को प्राकृतिक खेती करने की सलाह दे दी है। ऐसा ही कदम कोरोना काल में विदेशी मुद्रा के हुए संकट के बीच 2021 श्रीलंका की गोटबया राजपक्षे सरकार ने उठाया था, जिससे वहां खेती तबाह हो गई थी। उससे पैदा हुआ खाद्य संकट 2022 में वहां हुए जन विद्रोह का प्रमुख कारण था।

भारत की पहले से कमजोर वित्तीय व्यवस्था को नई परिस्थितियों ने संकट-ग्रस्त बना दिया है। केंद्र और ज्यादातर राज्य सरकारें हर साल अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक कर्ज ले रही हैं। पिछले वित्त वर्ष में भारत सरकार ने 14 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। इस वर्ष वह 17.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। कर्ज की बढ़ी मांग के कारण नया ऋण अधिक ब्याज पर मिल रहा है। इससे देश का भविष्य खतरे में पड़ रहा है।

*ये बातें याद दिलाने की जरूरत इसलिए पेश आई, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार की करनी से पैदा हुई समस्या का मुकाबला करने की सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी है।* मगर उससे हालात नहीं सुधरेंगे। बेहतर होगा सरकार उन कदमों को वापस ले, जिनकी वजह से भारत को तेल, गैस और विदेशी मुद्रा का संकट झेलना पड़ रहा है। साथ ही संकट को संभालने के लिए वह सारे देश को भरोसे में ले।

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद कई देशों ऊर्जा एवं डॉलर बचाने के उपाय अपनाए। मगर भारत में बात तब शुरू हुई है, जब पानी सिर तक पहुंच गया है। तब भी बात सिर्फ नागरिकों तक है। जो भारतीय कंपनियां अरबों डॉलर का अमेरिका में कर रही हैं, उनमें देशभक्ति की भावना जगाने का आह्वान मोदी ने नहीं किया है।

इस सिलसिले में यह उल्लेख अवश्य होना चाहिए भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट पहले से ही गंभीर रूप लेता गया था। तमाम गंभीर अर्थशास्त्री और थिंक टैंक इसकी चेतावनी देते रहे हैं। अभी कुछ समय अमेरिका स्थित ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने खुले पत्र में भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं का जिक्र किया।

बर्नस्टीन रिसर्च ने कहा कि भारत में रोजगार का सवाल चक्रीय नहीं, बल्कि अस्तित्वगत (existential, not cyclical) हो गया है। भारत का IT/ BPO क्षेत्र लगभग एक से डेढ़ करोड़ लोगों को रोज़गार देता है और देश में मध्य वर्ग का मुख्य आधार है। जनरेटिव एआई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) के कारण इस क्षेत्र में रोजगार के लिए प्रत्यक्ष खतरा पैदा हो गया है। मैनुफैक्चरिंग सेक्टर इस योग्य नहीं है कि यहां नौकरी गंवाने वाले कर्मियों को अपने में खपा सके।
भारत का कृषि क्षेत्र 1970 के दशक के नीति चक्र में अटका हुआ है। इस क्षेत्र पर आज भी श्रम शक्ति का 42 से 45 फीसदी हिस्सा निर्भर है, जबकि जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान महज 15-16 प्रतिशत है। ज्यादातर कृषकों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है, कोल्ड स्टोरेज एवं अन्य कृषि सुविधाओं का अभाव है और फसल बिक्री की ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिससे कृषि क्षेत्र की आमदनी बढ़ सके। एआई अर्थव्यवस्था में निर्माता के बजाय भारत एक स्थायी उपभोक्ता बनकर रह जा सकता है। इसका कारण घरेलू एआई मॉडलों का अभाव है। फिलहाल सूरत यह है कि इस क्षेत्र का अधिकांश लाभ अमेरिका और चीन के पास केंद्रित हो रहा है।

कैश ट्रांसफर योजनाओं से चुनाव जीतने की लगी होड़ के कारण राजकोष पर दबाव बढ़ रहा है। सियासी मकसद से शुरू की गई इन योजनाओं पर सालाना लगभग 1.7 से 2.5 लाख करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। यह खर्च सड़क, सिंचाई, और अनुसंधान (R&D) जैसे निर्णायक महत्त्व क्षेत्रों में निवेश की कीमत पर किया जा रहा है। कारखाना क्षेत्र में पश्चिम कंपनियों की चीन+1 रणनीति से भारत अपेक्षित लाभ नहीं उठा पाया है। मैनुफैक्चरिंग का जीडीपी में केवल 16-17 प्रतिशत योगदान बना हुआ है और रोज़गार सृजन की इसकी क्षमता सीमित है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी जैसे महत्वपूर्ण कलपुर्जों के लिए भी आयात निर्भरता बनी हुई है।
भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) खर्च जीडीपी का मात्र 0.6-0.7 प्रतिशत है, जो वैश्विक मानकों से काफी कम है। आविष्कार आधारित अर्थव्यवस्था बनने के लिहाज से यह बेहद नाकाफी है। बर्नस्टीन ने आगाह किया ये स्थितियां भारत को कम उत्पादकता वाली ऐसी अर्थव्यवस्था बनाए रखेंगी, जहां राजकोष का पैसा भविष्य की क्षमता विकसित करने के बजाय मौजूदा खपत पर खर्च होता रहेगा।

तो ये भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ये खासकर वर्तमान लेकिन आम तौर पर पूर्व सरकारों की आर्थिक प्राथमिकताओं का परिणाम हैं। ईरान युद्ध से पैदा हुए संकट ने इन मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। इससे भारत की विकास कथा ना सिर्फ ठहर गई है, बल्कि अवनति के लक्षण हर रोज ज्यादा साफ होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरत सिर्फ नई मुसीबतों पर नहीं, बल्कि नव-उदारवादी दौर में भारत की आर्थिक दिशा को समझने और उसके विकल्प पर विचार करने की है।
दिनांक- 13 मई 2026

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