वैश्विक संकट की आड़ में वर्क फ्रॉम होम मॉडल: क्या उत्तराखंड की जमीनी चुनौतियों पर भी होगी बात?
देहरादून। पुष्कर सिंह धामी सरकार ने बुधवार को ऊर्जा और ईंधन बचत के नाम पर कई बड़े फैसलों की घोषणा की। इनमें वर्क फ्रॉम होम, नो व्हीकल डे, मंत्रियों और अधिकारियों के वाहन बेड़े में 50 प्रतिशत कटौती, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता जैसे कदम शामिल हैं। सरकार ने इन फैसलों के पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती वैश्विक ईंधन लागत को प्रमुख कारण बताया है।
कैबिनेट बैठक में कहा गया कि सरकारी विभागों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आधारित बैठकों को बढ़ावा दिया जाएगा और निजी क्षेत्र को भी वर्क फ्रॉम होम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा। सप्ताह में एक दिन नो व्हीकल डे मनाने और आम जनता को भी इसके लिए प्रोत्साहित करने की बात कही गई है। इसके साथ ही सरकारी विदेशी यात्राओं में कटौती, AC उपयोग सीमित करने, सार्वजनिक परिवहन और EV उपयोग बढ़ाने जैसे फैसले भी लिए गए हैं।
हालांकि सरकार के इन फैसलों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां अब भी कई ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी कमजोर है, वहां वर्क फ्रॉम होम कितना व्यवहारिक साबित होगा, यह बड़ा सवाल है। दूसरी ओर, सरकारी कार्यालयों में पहले से लंबित फाइलों और धीमी कार्यप्रणाली को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि इससे आम लोगों की दिक्कतें और बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल प्रतीकात्मक नो व्हीकल डे घोषित करने से देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे शहरों की लगातार बढ़ती ट्रैफिक और अव्यवस्थित शहरीकरण की समस्या का समाधान नहीं होगा। हाल के वर्षों में राज्य में ट्रैफिक दबाव, अनियोजित विकास और सार्वजनिक परिवहन की कमजोर व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर भी लोग सरकार से दीर्घकालिक शहरी योजना और मजबूत परिवहन नीति की मांग करते रहे हैं।
सरकार ने एक अधिकारी, एक वाहन नीति, सार्वजनिक बस सेवाओं के विस्तार और 50 प्रतिशत नए सरकारी वाहनों को EV बनाने की घोषणा की है। लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो उसे पहले सरकारी वीआईपी संस्कृति, अनियोजित निर्माण, पहाड़ों में बढ़ते खनन और ट्रैफिक प्रबंधन पर ठोस कार्रवाई करनी होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार की ईंधन बचत और मितव्ययिता अपील के बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्य राज्यों में भी इसी तरह के कदम देखने को मिल रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये फैसले दीर्घकालिक नीति बदलाव बन पाएंगे या फिर केवल वैश्विक संकट के दौर में लिया गया एक अस्थायी प्रशासनिक संदेश साबित होंगे।