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शिक्षा का बाज़ार और दांव पर लगा बचपन: एक विश्लेषण आज के दौर में शिक्षा की चमक जितनी बढ़ी है

शिक्षा का बाज़ार और दांव पर लगा बचपन: एक विश्लेषण
आज के दौर में शिक्षा की चमक जितनी बढ़ी है, उसके पीछे का अंधेरा उतना ही गहरा हुआ है। विशेष रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं (NEET, JEE) की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों ने एक ऐसा समानांतर तंत्र खड़ा कर लिया है, जहाँ छात्र केवल एक 'रोल नंबर' बनकर रह गए हैं।
1. कोचिंग संस्थानों की प्रामाणिकता: विज्ञापन बनाम वास्तविकता
ज्यादातर बड़े कोचिंग संस्थान अपनी प्रामाणिकता साबित करने के लिए अखबारों के पहले पन्ने पर उन टॉपर्स की तस्वीरें छापते हैं, जो अक्सर कई संस्थानों से 'जुड़े' होते हैं।
सफलता का श्रेय: यदि बच्चा सफल हुआ तो वह संस्थान की जीत है, लेकिन यदि वह असफल हुआ तो वह छात्र की व्यक्तिगत विफलता करार दे दी जाती है।
फीस का मकड़जाल: भारी-भरकम फीस लेने के बावजूद, कई संस्थानों में सुरक्षा, मानसिक परामर्श (Counseling) और व्यक्तिगत मार्गदर्शन का अभाव होता है। 'गारंटीड सिलेक्शन' के वादे अक्सर केवल कागजी साबित होते हैं।
2. अभिभावकों का त्याग और अंतहीन दर्द
एक मध्यमवर्गीय पिता जब अपने बच्चे को कोटा, सीकर या अहमदाबाद जैसे शहरों में भेजता है, तो वह केवल अपनी जमा-पूंजी नहीं भेजता, बल्कि अपनी पूरी उम्र की उम्मीदें भेज देता है।
कर्ज का बोझ: कई परिवार ऐसे हैं जो खेत गिरवी रखकर या लोन लेकर इन संस्थानों की लाखों की फीस भरते हैं। उनके लिए पेपर लीक होना या परीक्षा रद्द होना केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि एक आर्थिक मंदी जैसा है।
भावनात्मक निवेश: अभिभावक इस डर में जीते हैं कि कहीं उनका बच्चा दबाव में कोई गलत कदम न उठा ले। यह दर्द तब और बढ़ जाता है जब व्यवस्था की भ्रष्टाचार रूपी दीमक उनके बच्चे की मेहनत को चाट जाती है।
3. बच्चों का भविष्य: मशीनीकरण की ओर बढ़ते कदम
कोचिंग कल्चर ने बच्चों के बचपन और उनकी रचनात्मकता को छीन लिया है।
प्रतियोगिता का दबाव: 15-16 साल की उम्र में बच्चे 14-14 घंटे पढ़ाई करते हैं। जब पेपर लीक जैसी घटनाएँ होती हैं, तो उनका व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य: लगातार बढ़ता तनाव और 'असफल' होने का डर उन्हें अवसाद की ओर धकेलता है। उनके लिए शिक्षा अब ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसी दौड़ बन गई है जिसे हर हाल में जीतना है, वरना वे खुद को 'हारे हुए' मानने लगते हैं।
4. व्यवस्था पर सवाल और निष्कर्ष
पेपर लीक माफिया और गैर-जिम्मेदार संस्थान मिलकर देश की सबसे कीमती संपत्तियुवा शक्तिके साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
पारदर्शिता की आवश्यकता: जब तक इन संस्थानों के विज्ञापनों और दावों की जांच के लिए कोई कड़ा सरकारी नियम नहीं बनता, तब तक यह शोषण जारी रहेगा।
नैतिकता का अभाव: समाज में 'दिखावे' और 'शोमैनशिप' की बढ़ती प्रवृत्ति ने वास्तविक योग्यता को हाशिए पर धकेल दिया है।
निष्कर्ष:
शिक्षा को 'सौदा' बनाने वाले इन व्यापारिक केंद्रों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी। बच्चों का भविष्य केवल एक परीक्षा के परिणाम पर निर्भर नहीं होना चाहिए, और न ही किसी अभिभावक का स्वाभिमान इन भ्रष्ट तंत्रों के हाथों की कठपुतली बनना चाहिए। हमें एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहाँ मेहनत करने वाले बच्चे का पसीना, किसी भ्रष्ट तिजोरी की चाबी न बन जाए।

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