सरकारी सूचना से निजी समृद्धि: कैसे 50 अधिकारियों ने बंजर जमीन को 11 गुना महंगा सोना बना दिया?
भोपाल के गुराड़ी घाट में सामने आया 'वेस्टर्न बाईपास लैंड डील' घोटाला भारतीय प्रशासनिक इतिहास में 'इनसाइडर ट्रेडिंग' और 'ब्यूरोक्रेटिक सिंडिकेट' का एक ऐसा काला अध्याय है, जहाँ लगभग 50 रसूखदार आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने लोकसेवा की शपथ को निजी तिजोरी भरने के माध्यम में बदल दिया; इन अधिकारियों ने पद की मर्यादा और गोपनीयता को ताक पर रखते हुए 3,200 करोड़ रुपये के प्रस्तावित सरकारी बाईपास प्रोजेक्ट की गुप्त जानकारी का अनुचित लाभ उठाया और प्रोजेक्ट की घोषणा से ठीक पहले 4 अप्रैल 2022 को एक साथ मिलकर कौड़ियों के भाव कृषि भूमि की रजिस्ट्री करवाई, जिसके मात्र 16 महीने बाद सरकार ने उसी क्षेत्र से बाईपास को मंजूरी दे दी और फिर प्रशासनिक रसूख का इस्तेमाल कर इस जमीन को 'आवासीय' घोषित करवा लिया गया जिससे इसका मूल्य महज दो वर्षों में 11 गुना यानी 3500% बढ़कर 5.5 करोड़ से सीधे 65 करोड़ रुपये के पार पहुँच गया। यह समूचा घटनाक्रम न केवल नैतिक पतन का प्रमाण है बल्कि एक गहरी नीतिगत डकैती है जहाँ नीति बनाने वाले, उसे मंजूरी देने वाले और उसके गुप्त लाभार्थी वही 'सफेदपोश' अधिकारी हैं, जिन्होंने आम जनता के टैक्स के पैसे से होने वाले विकास को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ाने का औजार बना लिया है।
यह सिंडिकेट कानून की बारीकियों का फायदा उठाकर 'स्मार्ट इन्वेस्टमेंट' के नाम पर जनता के भरोसे का कत्ल कर रहा है और सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को ठेंगा दिखा रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि जब रक्षक ही मुनाफे के शिकारी बन जाएं तो तंत्र की पारदर्शिता सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है और लोकतंत्र की नैतिकता इन अधिकारियों के रसूख तले दम तोड़ देती है।