मुफ्त सुविधाओं और चुनावी फिजूलखर्ची पर कब लगेगी रोक
मुफ्त सुविधाओं और चुनावी फिजूलखर्ची पर कब लगेगी रोक
देश की आर्थिक स्थिति, बढ़ती महंगाई, रुपये की गिरती कीमत, बेरोजगारी और आम जनता पर बढ़ते बोझा को लेकर लोगों में आक्रोश होना स्वाभाविक है। जब जनता रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही हो, तब सरकार द्वारा त्याग और संयम की अपील करना कई लोगों को विरोधाभासी लगता है।
आज देश का मध्यम वर्ग, किसान, युबा और मजदूर लगातार आर्थिक दबाव झेल रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, रोजगार की कमी और छोटे व्यापारियों की बदहाल स्थिति ने आभनागरिक की कमर तोड़ दी है। ऐसे समय में यदि सत्ता में बैठे लोग स्वयं आलीशान जीवन, महने चुनावी अभियान, विदेशी दौरों और बड़े-बड़े आयोजनों पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करें, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
देश की जनता से कहा जा रहा है कि सोना मत खरीदो, बिदेश मत जाओ, तेल कम इस्तेमाल करो, खर्च कम करो, लेकिन क्या सत्ता में बैठे लोग खुद इन बातों का पालन कर रहे हैं? क्या सरकार अपने अनावश्यक खचों में कटौती कर रही है? क्या जनता को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा देने में पूरी ईमानदारी दिखाई जा रही है?
यदि वास्तव में देशहित में बचत और त्याग की शुरूआत करनी है, तो सबसे पहले देश के विधायक, सांसद, मंत्री और बड़े नेताओं को मिलने बाली अनावश्यक सुविधाओं पर रोक लगनी चाहिए। मुफ्त की गाड़ियां, हवाई यात्रा, रेल यात्रा, मुफ्त पेट्रोल-डीजल, टोल टैक्स छूट, सरकारी बंगले, फर्नीचर, मोबाइल, खान-पान और अन्य विलासिता पर होने वाले खचर्चों की समीक्षा होनी चाहिए। जनता टैक्स दे और नेता ऐश करें, यह व्यवस्था अब देशहित में उचित नहीं मानी जा सकती।
इसके साथ ही पूर्व सांसदों और विधायकों को मिलने वाली आजीवन पेंशन और विशेष सुविधाओं पर भी गंभीर विचार होना चाहिए। जब देश का आम नागरिक महंगाई से जूझ रहा हो, तब जनता के पैसे का उपयोग केवल राजनीतिक विशेषाधिकारों के लिए नहीं होना चाहिए।
चुनावों में करोड़ों रुपये के बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर, रोड शो, प्रचार वाहनों और दिखावटी कार्यक्रमों पर जो अपार धन खर्च होता है, उस पर भी सख्त नियंत्रण लगाया जाना चाहिए। यदि नेता वास्तव में राष्ट्रहित की बात करते हैं, तो त्याग और सादगी की शुरूआत सबसे पहले उन्हें स्वयं करनी होगी।
विश्वगुरु बनने का सपना केवल नारों और प्रचार से पूरा नहीं होता। इसके लिए मजबूत अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समानत्ता और जनता का विश्वास जरूरी होता है। जब आम नागरिक खुद को असुरक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर महसूस करे, तब केबल भावनात्मक अपीलों से देश आगे नहीं बढ़ सकता।
लोकतंत्र में जनता सवाल पूछेगी और सरकार को जवाब देना होगा। सत्ता जनता की सेवा के लिए होती है, जनता पर बोझ डालने के लिए नहीं। देशहित का सबसे बड़ा संदेश वही सरकार दे सकती है जो पहले खुद पारदर्शिता, सादनी और जबाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत करे।
धन्यबाद।
आपका
पत्रकार, मुंबई
विवेक ब्रह्म देव मिश्रा
विश्व सनातन कल्याण संघ ( जिला प्रवक्ता, ठाणे )