बढ़ती तेल कीमतों के प्रभाव को नियंत्रित करने पर सरकार और आरबीआई के बीच मंथन:-
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार पर संभावित दबाव को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय तथा वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ महत्वपूर्ण विचार-विमर्श किया है। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में उन संभावित आपातकालीन उपायों पर चर्चा की गई, जिनके माध्यम से भारत की अर्थव्यवस्था को बढ़ती ऊर्जा लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव से सुरक्षित रखा जा सके। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार फिलहाल कई विकल्पों पर विचार कर रही है, जिनका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा, आयात बिल को नियंत्रित करना तथा आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। हालांकि अभी तक किसी भी प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। सूत्रों के अनुसार जिन संभावित उपायों पर चर्चा हुई, उनमें ईंधन कीमतों में वृद्धि, गैर-जरूरी आयातों पर नियंत्रण तथा विदेशी मुद्रा के अत्यधिक बहिर्गमन को रोकने के विकल्प शामिल हैं। सरकार कथित रूप से सोना और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं जैसे गैर-आवश्यक आयातों पर सख्ती बढ़ाने की संभावना पर भी विचार कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक देशों में शामिल है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में तेजी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि तेल महंगा होता है, तो आयात बिल बढ़ता है, जिससे व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही महंगाई, परिवहन लागत और उत्पादन खर्च में भी वृद्धि होने की आशंका रहती है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज क्षेत्र से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है, इसलिए किसी भी आपूर्ति बाधा या कीमत वृद्धि का असर घरेलू बाजारों पर तेजी से दिखाई दे सकता है। सूत्रों का कहना है कि सरकार फिलहाल सावधानी और तैयारी की रणनीति पर काम कर रही है। आर्थिक मामलों के जानकारों के अनुसार यदि परिस्थितियां और गंभीर होती हैं, तो सरकार अस्थायी आयात नियंत्रण, अतिरिक्त शुल्क, ईंधन मूल्य संशोधन अथवा विदेशी मुद्रा बचत से जुड़े कदम उठा सकती है। सोने के आयात को लेकर भी सरकार पहले से सतर्क रही है। भारत विश्व के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में से एक है और भारी मात्रा में सोने का आयात विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालता है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का आयात भी बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा खर्च करता है। इसलिए इन क्षेत्रों में नियंत्रण संबंधी चर्चा को आर्थिक संतुलन बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि सरकार और आरबीआई के बीच यह परामर्श संकेत देता है कि नीति-निर्माता वैश्विक परिस्थितियों को लेकर गंभीर हैं और संभावित आर्थिक झटकों के लिए पहले से तैयारी कर रहे हैं। हालांकि यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि अभी तक किसी कठोर कदम पर अंतिम सहमति नहीं बनी है। फिलहाल बाजार और उद्योग जगत सरकार के अगले कदमों पर नजर बनाए हुए हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार वृद्धि जारी रहती है, तो आने वाले समय में ईंधन, आयात नीति और विदेशी मुद्रा प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं।