की मुकद्दस सरज़मीन पर सफ़ेद संगमरमरअजमेरसोलह खंबा'
अजमेर की मुकद्दस सरज़मीन पर सफ़ेद संगमरमर से तराशा गया यह 'सोलह खंबा' महज़ एक तारीखी इमारत नहीं, बल्कि अहदे-मुगलिया की शान और चिश्ती घराने की रूहानियत का एक अनमोल दस्तावेज़ है। सन् 1659 (1070 हिजरी) में तामीर किया गया
यह मक़बरा हज़रत शेख अलाउद्दीन की याद दिलाता है, जो न सिर्फ शहंशाह शाहजहाँ के दौर के एक मर्तबेदार बुज़ुर्ग थे, बल्कि सुल्तान-उल-हिंद हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ (र.अ.) के ही ख़ानदान के चश्म-ओ-चिराग थे। 16 मज़बूत सुतूनों (खंभों) पर टिकी यह आयताकार संरचना अपनी सादगी और नफ़ासत के लिए मशहूर है, जिसके मग़रिबी हिस्से में तीन मेहराबों वाली एक बेहद पुर-सुकून मस्जिद वाक़े है।
यहाँ की दीवारों पर मौजूद फारसी कतबे और अंदर मौजूद छह मुकद्दस मज़ारें आज भी उस दौर की अज़मत की गवाही देती हैं। अजमेर शरीफ आने वाले ज़ायरीन के लिए यह एक ऐसी 'हिडन जेम' है, जहाँ हुजूम से दूर रूह को एक खास तस्कीन और ख़ामोशी मयस्सर होती है।