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यावल: सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों की 'दांडी यात्रा'; कुर्सियां खाली, जनता बेहाल, प्रशासन सोया!

यावल
शासन जनता की सेवा के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर दफ्तर बनाता है, अधिकारियों को मोटा वेतन दिया जाता है, लेकिन यावल तहसील के सरकारी कार्यालयों में नजारा इसके बिल्कुल उलट है। यहाँ दफ्तरों में नागरिक तो नजर आते हैं, लेकिन साहब की कुर्सियां अक्सर खाली मिलती हैं। अधिकारियों की इस 'मनमर्जी' और अनुपस्थिति ने आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है।
'कल आना' और 'मीटिंग है' के बहानों से जनता त्रस्त
तहसील के विभिन्न कार्यालयों में दूर-दराज से लोग अपने काम लेकर आते हैं। किसी को जाति का प्रमाण पत्र चाहिए, किसी को अनुदान की प्रतीक्षा है, तो कोई सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने आता है। लेकिन कार्यालय पहुँचते ही उन्हें रटा-रटाया जवाब मिलता है "साहब मीटिंग में हैं," "साहब बाहर गए हैं," या "कल आना।"
बार-बार चक्कर काटने के कारण नागरिकों को न केवल आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है, बल्कि उन्हें भारी मानसिक प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ रहा है।
सिर्फ तहसील और पुलिस विभाग में थोड़ी राहत
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, तहसील कार्यालय और पुलिस प्रशासन में कुछ अधिकारी अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते दिखते हैं, जिससे वहाँ का कामकाज पटरी पर नजर आता है। लेकिन इसके विपरीत, अन्य कई विभागों में अनुशासनहीनता अपनी चरम सीमा पर है। इन विभागों में अधिकारियों का गायब रहना अब एक 'नया रिवाज' बन गया है।
जनता के चुभते सवाल:
जब शासन की घोषणा "जनता के लिए प्रशासन" की है, तो अधिकारी जनता से दूर क्यों भाग रहे हैं?
अगर एक छोटा कर्मचारी लेट हो जाए तो उस पर कार्रवाई होती है, फिर इन 'लाटसाहबों' पर लगाम कौन कसेगा?
क्या सरकारी दफ्तर अब सिर्फ खाली कुर्सियों के प्रदर्शन केंद्र बनकर रह जाएंगे?
कार्रवाई की मांग ने पकड़ा जोर
यावल की जनता अब इस ढर्रे से तंग आ चुकी है। नागरिकों ने मांग की है कि इन लापरवाह और निष्क्रिय अधिकारियों की तत्काल जांच की जाए और उनकी उपस्थिति अनिवार्य की जाए। लोगों का कहना है कि जो अधिकारी समय पर काम न करें, उन पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
निष्कर्ष:
यदि सरकारी दफ्तरों में ताले लटकते रहे और कुर्सियां खाली रहीं, तो सरकार के 'पारदर्शी प्रशासन' के दावों की हवा निकलना तय है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन बेपरवाह अधिकारियों पर कब हंटर चलाता है।

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