सिंगरौली में भूमि अधिग्रहण को लेकर फिर गरमाई बहस, अभ्युदय सिंह (डैनी) की नई अपील
सिंगरौली में भूमि अधिग्रहण को लेकर फिर गरमाई बहस, अभ्युदय सिंह (डैनी) की नई अपील
सिंगरौली में कोयला परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण को लेकर चल रहा असंतोष अब केवल स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जनअधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है। कांग्रेस के वन एवं पर्यावरण प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव अभ्युदय सिंह (डैनी) ने एक बार फिर सार्वजनिक अपील जारी कर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
डैनी द्वारा जारी संदेश में आरोप लगाया गया है कि नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के माध्यम से सिंगरौली में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी, प्रभावित परिवारों की उपेक्षा और मनमाने निर्णय लिए जा रहे हैं। उन्होंने Ipsedixitism शब्द का प्रयोग करते हुए तंज कसा कि कई फैसले जो हम कहें वही सही वाली मानसिकता के साथ लागू किए जा रहे हैं, जबकि प्रभावित लोगों को प्रक्रिया में उचित भागीदारी तक नहीं दी जा रही।
अपने संदेश में उन्होंने विस्थापितों और अधिग्रहण प्रभावित परिवारों से जागरूक रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि लोग किसी भी निर्णय को केवल सरकारी आदेश मानकर बिना जानकारी स्वीकार न करें, बल्कि अपने अधिकारों, उचित मुआवजे, पुनर्वास और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर सवाल पूछें।
यह अपील केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि सिंगरौली के सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर भी टिप्पणी करती है। डैनी ने अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार तंत्र पर भी निशाना साधते हुए संकेत दिया कि विकास के नाम पर प्रभावित लोगों की आवाज को नजरअंदाज किया जा रहा है।
उन्होंने नागरिकों से अपने फेसबुक पर साझा खुले पत्र को पढ़ने, परिवार और समुदाय में चर्चा करने तथा जागरूकता फैलाने की अपील की है। उनके अनुसार विकास का अर्थ लोगों के अधिकारों और सम्मान की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
सिंगरौली लंबे समय से देश की ऊर्जा राजधानी के रूप में पहचाना जाता रहा है, लेकिन इसके साथ ही विस्थापन, प्रदूषण और पुनर्वास के मुद्दे भी लगातार सामने आते रहे हैं। ऐसे में अभ्युदय सिंह (डैनी) की यह नई सार्वजनिक अपील एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ले आई है कि विकास और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन और खनन कंपनियां इन सवालों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती हैं, क्योंकि क्षेत्र में बढ़ती जनचर्चा यह संकेत दे रही है कि लोग अब अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक मुखर हो रहे हैं।