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कविता : देश की मिट्टी

देश की मिट्टी की खुशबू में,
एक अनोखी बात है,
हर कण में इतिहास छुपा,
हर रग में जज़्बात है।

यह मिट्टी सिर्फ ज़मीन नहीं,
ये माँ की गोद सी लगती है,
थक कर जब भी गिर जाऊँ,
ये चुपके से संभालती है।

कभी खेतों में लहलहाती,
कभी सीमा पर अड़ जाती है,
कभी किसान के पसीने में,
कभी सैनिक के लहू में समाती है।

इसकी महक में गाँव बसें,
इसकी छाँव में शहर पले,
इससे ही हर सपना जुड़ा,
इससे ही अपने कल चले।

जब भी आंधी आती है,
ये मिट्टी दीवार बन जाती है,
हर मुश्किल के आगे झुककर,
फिर भी सीना तान खड़ी हो जाती है।

इसने ही हमें सिखाया है,
मिल-जुल कर आगे बढ़ना,
धर्म, जाति सब भूलकर,
एक धागे में सबको गढ़ना।

इस मिट्टी में राम की मर्यादा,
इसमें कृष्ण की लीला है,
गांधी की सादगी भी इसमें,
और भगत सिंह का जज़्बा भी जीता है।

जब कोई इसे ललकारे,
ये अग्नि बन धधक उठती है,
अपने बच्चों की रक्षा में,
हर हद से आगे बढ़ जाती है।

इसकी गोद में खेल-खेल कर,
हमने जीवन जीना सीखा,
हर गिरावट से उठ जाना,
और हर दर्द को पीना सीखा।

देश की मिट्टी, तू महान है,
तेरी शान में सर झुकता है,
तेरे हर कण को चूमने को,
दिल हर पल मचलता है।

तू ही मेरी पहचान है,
तू ही मेरा अभिमान है,
तेरे बिना मैं कुछ भी नहीं,
तू ही मेरा सम्मान है।

आखिरी साँस तक तुझसे,
ये रिश्ता यूँ ही निभाऊँगा,
तेरे कण-कण की रक्षा में,
अपना सब कुछ लुटाऊँगा।

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