भगवान को मानते-मानते खुद भगवान बन बैठे"भक्त से भगवान बनने की जिद में मिट गए भस्मासुर से रावण तक: 'अहम् ब्रह्मास्मि' का अहंकार बना पतन का कारण"
भगवान को मानते-मानते खुद भगवान बन बैठे
"भक्त से भगवान बनने की जिद में मिट गए भस्मासुर से रावण तक: 'अहम् ब्रह्मास्मि' का अहंकार बना पतन का कारण"
धर्म-विश्लेषण। कई बार व्यक्ति भगवान को मानते-मानते खुद को ही भगवान मानने लगता है। भस्मासुर, हिरण्यकश्यप और रावण जैसे चरित्र इसी "अहम् ब्रह्मास्मि" की गलत व्याख्या के अग्रदूत रहे हैं। ईश्वरीय सत्ता पर जितनी इनकी आस्था थी, उतनी साधारण मनुष्य की कहाँ हो पाती है? लेकिन यही आस्था जब अहंकार में बदली तो विनाश का कारण बन गई।
वरदान बना अभिशाप
भस्मासुर को शिव से भस्म करने का वरदान मिला तो वो सबको भस्म करने लगा। अंत में उसी वरदान ने उसे राख कर दिया। हिरण्यकश्यप ने तप से अमरता का वरदान मांगा और खुद को ही भगवान घोषित कर दिया। रावण ने भी शिव की भक्ति से शक्ति पाई, लेकिन उसका उपयोग अपनी क्षुद्र प्रभुता जमाने के लिए किया।
भगवान को मानते-मानते खुद भगवान बन बैठे
इन तीनों की त्रासदी यह नहीं थी कि वे नास्तिक थे। इनकी त्रासदी यह थी कि ये 'अहंकारी आस्तिक' थे। इन्होंने ईश्वर की सत्ता को 'नकारा' नहीं, बल्कि उसे 'हथियाने' की कोशिश की। तप, भक्ति और वरदान पाकर ये भूल गए कि शक्ति सेवा के लिए है, शासन के लिए नहीं।
बूंद और समुद्र का फर्क
'अहम् ब्रह्मास्मि' का अर्थ है "मैं ब्रह्म हूँ" - यानी मेरी आत्मा परमात्मा का अंश है। लेकिन इन चरित्रों ने इसका अर्थ लगाया - "मैं ही परमात्मा हूँ"। वे भूल गए कि बूंद जब समुद्र में मिलती है तो वह समुद्र 'हो' जाती है, लेकिन वह समुद्र को अपने भीतर नहीं समा सकती। ईश्वर में लीन होना भक्ति है, ईश्वर को अपने अधीन करना अहंकार है।
आज के दौर में भी प्रासंगिक
यह कथा सिर्फ पौराणिक नहीं है। आज भी जब कोई व्यक्ति पद, पैसा या सत्ता पाकर खुद को सर्वशक्तिमान समझने लगता है, तो वह इसी अहंकारी आस्तिक की राह पर चल पड़ता है। इतिहास गवाह है - जो भी खुद को भगवान समझा, उसका अंत निश्चित हुआ।
भक्ति विनम्र बनाती है, अहंकार रावण बना देता है।