अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा के आधार स्तम्भ मोहनलाल शर्मा 94 पंचतत्व में विलीन।
अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा के आधार स्तंभ मोहनलाल शर्मा 94 पंचतत्व में विलीन, महासभा एवं समाज की अपूरणीय छति।
पाली- अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा के सम्पोषक सदस्य अंगिरा वंशज सायल परिवार गाजणगढ के भीष्म पितामह चार पीढीयों के साकार रूप 94 वर्षीय मोहनलाल शर्मा रविवार को पंचतत्व में विलीन हो गये। वे अन्तिम समय में सांसारिक मोह-माया और परिवार का मोह छोड़कर समाधिस्थ हो गये थे इसी अवस्था में 10 मई को सुबह उन्होंने यह नश्वर शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करने के लिए प्रस्थान किया। उसी दिन शाम को 5 बजे हिन्दू सेवा मंडल स्वर्गाश्रम आबूरोड में परिवार और रिश्तेदारों और समाज के सेकंडों लोगों की मोजूदगी में उनका पूर्ण वैदिक विधि विधान से अन्तिम संस्कार कर दिया गया। इसके साथ ही आपका भोतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया।
आप अपने पिछे तीन पुत्र उदयकिशन, सम्पत शर्मा, शैलेन्द्र शर्मा और एक पुत्री यशोदा सहित पोत्र पोत्रियो दोहिता दोहितियो का भरा-पुरा परिवार छोड़कर गये हैं। आपने जीवन पर्यन्त किसी प्रकार का नशा नहीं किया यहां तक की चाय भी नहीं पी इसलिए आपको कोई शारिरिक या मानसिक रोग नहीं था। आप आजीवन अपने प्रेतृत्व गांव गाजणगढ, सायल परिवार और जांगिड समाज रोहट से जुड़े रहे।
आपके निधनं पर अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा प्रदेश सभा तमिलनाडु अध्यक्ष कन्हैयालाल मांकड़, कोषाध्यक्ष हिरालाल जोहड़, महासभा के आध्यात्मिक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय प्रचार मंत्री घेवरचंद आर्य,
अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा पाली सभाग प्रभारी अशोक अठवासिया, पूर्व जिलाध्यक्ष ओमप्रकाश लूजा, श्री विश्वकर्मा जांगिड़ समाज सेवा समिति पाली अध्यक्ष मोहनलाल रालडियां, जांगिड़ समाज रोहट अध्यक्ष किशनलाल गुगरीयां, परामर्शदाता भंवरलाल मांकड़ आदि ने शोक संतप्त परिवार जनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए गहरा दुःख व्यक्त किया है।
मोहनलाल शर्मा का परिचय
सन् 1933 में पाली जिले के गाजणगढ गांव में अंगिरा वंशज रूपाराम सायल के घर माता कसनीदेवी की कोख से आपका जन्म हुआ। आपने स्वामी ऋतमानन्द जी अंगिरा के पास गुरुकुल विज्ञान आश्रम पाली में प्राथमिक शिक्षा एवं धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया जिसके फलस्वरूप आपके विचारों में परिवर्तन आया । अध्ययन के पश्चात आप सिरोही की एक सिमेन्ट फेक्ट्री में नोकरी करने लगे पश्चात आपने नोकरी छोड़कर औधोगिक क्षैत्र रीकों आबूरोड में अंगिरा हेवी इंजीनियरिंग के नाम से उद्योग स्थापित किया।
महासभा से जुडाव
सन् 1980 के दशक में आप अखिल भारतीय जांगिड़ ब्राह्मण महासभा दिल्ली से जुड़े और 11000/- रूपये देकर आजीवन विशेष सम्पोषक सदस्य बने। आप जहां भी जाते महासभा संविधान एवं नियम उद्देश्य का प्रचार प्रसार करते जिसके तहत सिर पर चोटी रखने, जनेऊ धारण करने और यज्ञ करने कराने पर जोर देते। तथा महासभा के सदस्य बनाते। और महासभा संविधान के अनुसार जांगिड़ ब्राह्मणों को जागरूक करते साथ ही ब्रह्मर्षि अंगिरा जी के बारे में लोगों को बताते और उनके हृदय में प्रगटाभूत अथर्ववेद पढने पढ़ाने की बात कहते। आप मृतक भोज, मौसर नुक्ता आदि के घोर विरोधी थे। इसलिए समाज में होने वाले ऐसे कार्यक्रमों में भाग नही लेते थे। परिवार एवं रिस्तेदारी में जहां कहीं भी मृतक भोज होता आप बैधड़क इसका विरोध करते और इसकी जगह स्वजातीय बंधुओं से हवन करवाने का अनुरोध करते। आपने अपनी मां कसनी देवी और पत्नी मोहिनी देवी के पीछे अपने गुरु ऋतमानन्द जी अंगिरा को बुलाकर शान्तियज्ञ करवाया था।
समाज सेवा के आयाम
आपने मां सती पदमा माता राणा जिला पाली तीर्थ के नवनिर्माण एवं प्रतिष्ठा करवाने का स्तृत्य प्रयास किया जिसके फलस्वरूप आज यह समस्त भारत के सायल परिवारो का एक मात्र तीर्थ बना हुआ है। इसके अलावा जांगिड समाज रोहट के आप आजीवन संरक्षक और परामर्शदाता रहे। आपके परामर्श से रोहट विश्वकर्मा मंदिर और छात्रावास में ब्रह्मर्षि अंगिरा जी की तस्वीर का अनावरण कर सभी को वितरण की गई जो घर-घर में काफी लोकप्रिय हुई।
कथनी एवं करनी में एकरूपता
अपकी कथनी और करनी में एकरूपता थी। जैसा आप आचरण करते वैसा ही बोलते थे और जैसा आप बोलते वैसा ही व्यवहार में आचरण करते इसलिए लोग आपकी बात को ध्यान से सुनते और कार्यरूप में आचरण भी करते थें। आबूरोड में आपने अपने परीश्रम से महासभा के कई सदस्य बनाकर शाखा स्थापित की है। आपकी शालीनता और मिलनसारिता बेमिसाल थी इसलिए जो भी आपसे मिलता वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। यही कारण है कि पाली के अलावा बाड़मेर आबूरोड और उदयपुर तक आपके द्वारा बनाएं गये महासभा के सदस्यों की लम्बी कतार है।
रिपोर्ट - घेवरचन्द आर्य पाली