क्या जनप्रतिनिधियों की मदद सिर्फ कैमरे तक सीमित है?
जमशेदपुर पूर्व विधानसभा के केवल बस्ती की एक महिला, जिनके पति का कुछ समय पहले निधन हो गया, और अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए किताबों की मांग की। आर्थिक तंगी से जूझ रही इस मां की मदद के लिए विधायक पूर्णिमा दास साहू आगे आईं और बच्चों को जरूरी किताबें उपलब्ध करवाईं। यह कदम निश्चित रूप से मानवीय संवेदनशीलता को दर्शाता है और बच्चों की शिक्षा रुकने से बच गई।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है।
जमशेदपुर ही नहीं, पूरे झारखंड में हजारों ऐसे परिवार हैं, जहां माता-पिता आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों की पढ़ाई, किताबें, फीस और जरूरी सुविधाएं तक नहीं जुटा पा रहे हैं। कई बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ देते हैं क्योंकि उनके पास कॉपी-किताब खरीदने तक के पैसे नहीं होते। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मदद केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रह जाती है जिनकी आवाज किसी नेता या कैमरे तक पहुंच जाए?
जनप्रतिनिधियों का काम केवल व्यक्तिगत सहायता देकर तस्वीरें खिंचवाना नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाना भी है जिससे हर जरूरतमंद बच्चे को शिक्षा का अधिकार सम्मानपूर्वक मिल सके। अगर सरकार और जनप्रतिनिधि चाहें तो क्षेत्र स्तर पर शिक्षा सहायता कोष, मुफ्त पुस्तक वितरण और जरूरतमंद परिवारों की पहचान जैसी योजनाओं को मजबूत किया जा सकता है।
समाज में दया और संवेदना दिखाना अच्छी बात है, लेकिन यदि यही संवेदनशीलता हर गरीब और संघर्षरत परिवार के लिए समान रूप से दिखाई दे, तभी असली जनसेवा कहलाएगी। वरना जनता के बीच यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि कुछ मददें जरूरत से ज्यादा छवि चमकाने का माध्यम बन जाती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या झारखंड में गरीब बच्चों की शिक्षा व्यवस्था नेताओं की व्यक्तिगत कृपा पर चलेगी, या सरकार ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिससे किसी बच्चे की पढ़ाई गरीबी के कारण न रुके?
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