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राज्य बना, सपने दिखाए गए, वादे हुए लेकिन लाखों युवाओं के हिस्से में केवल पलायन आया।

मुझे और मेरे जैसे लोगों को स्थाई राजधानी गैरसैण क्यों चाहिए?

सालों पहले घर-परिवार की जिम्मेदारियों ने मुझे अपने ही राज्य से दूर कर दिया। दूसरे राज्यों में जाकर रोज कुआँ खोदने जैसी मेहनत की, तब कहीं परिवार का पालन-पोषण हो पाया। उस समय सोचा था कि कुछ वर्षों की बात है, फिर लौटकर अपने घर, अपने गाँव, अपने लोगों के बीच जीवन बिताऊँगा। मगर समय बीतता गया, जिम्मेदारियाँ खत्म नहीं हुईं और जिंदगी का लगभग समय दूसरे राज्यों मे ही गुजर गया , आज भी मेरे उत्तराखंड मे मेरे अपने राज्य मे रोजगार नही है और वही कहानी फिर से दोहराई जा रही है।
आज भी मन में एक सवाल बार बार उठता रहता हैजब सालों पहले दूसरे राज्य मुझे 4000/5000 रुपये की नौकरी दे सकते थे, तो मेरा अपना उत्तराखंड मुझे सम्मानजनक रोजगार क्यों नहीं दे पाया? राज्य बना, सपने बने, वादे हुए, लेकिन लाखों युवाओं के हिस्से में पलायन ही आया।
और मन बार-बार सोचता है, अगर पहाड़ की राजधानी पहाड़ में ही बन जाती, अगर सत्ता और व्यवस्था गाँव-गाँव की पीड़ा को समझने वाली धरती पर बसती, तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। शायद रोजगार के अवसर पहाड़ तक पहुँचते, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग गाँवों तक आते, और लाखों लोगों को अपने घर-आँगन छोड़कर परदेस की ठोकरें न खानी पड़तीं।
सबसे बड़ा दर्द यह नहीं कि जीवन मजदूरी और अपनों से दूर दूसरे राज्यों में बीत गया, बल्कि यह है कि ज्यादातर मेरे भाई लोग अंतिम समय में न माँ की सेवा कर पाते हैं , न पिता के पास रहकर उसकी ताकत बन पाते हैं । जिनके लिए घर छोड़ा कि दो पैसे कमाकर माँ बाप को खुश रखेंगे उन्हीं के अंतिम क्षणों में साथ न होना इस पीड़ा को शब्दों में कैसे कहा जाए?
आज भी महानगरों में हजारों पहाड़ी परिवार 15 से 20 हजार रुपये में 12 से 14 घंटे की गुलामी कर रहे हैं। किराए के मकान, कर्ज से बने अधूरे घर, और फिर घर आने के लिए भी उधार। वापस शहर पहुँचने के बाद महीनों तक उसी उधारी को चुकाने के लिए फिर वही संघर्ष।
अंततः आदमी या तो बीमार होकर लौटता है, या राख बनकर अपने गाँव, घर पहुँचता है।
यह केवल मेरी कहानी नहीं, यह उत्तराखंड के लाखों परिवारों की कहानी है। पचीस साल बाद भी यदि राज्य का युवा अपने घर में सम्मानजनक रोजगार न पा सके, यदि गाँव खाली हों, यदि माँ-बाप बेटे की राह देखते रह जाएँ, तो फिर हमें खुद से पूछना होगाराज्य बना किसके लिए?
क्या चंद पूजीपतियों के लिए?
क्या राजनेताओं के लिए?
कब तक आखिर कब तक हमारे पहाड़ का युवा अन्य राज्यों की धूल फाँकता रहेगा? कब तक माँ की आँखें बेटे के इंतजार में सूखती रहेंगी? कब तक पिता की चिता पर बेटे की जगह कोई और कंधा देगा?
उत्तराखंड केवल नक्शे पर बना राज्य नहीं, यह उन लोगों का सपना था जो अपने घर में जीना चाहते थे। अगर लोग ही घर छोड़ रहे हैं तो राज्य का सपना आज भी अधूरा ही है.....
और उत्तराखंड की कहानी आज भी अधूरी ही है दुःखद और सोचनीय.....

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