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कालचक्र

बेटी की शादी से पहले उठ गया पिता का साया: बिजली के खंभे पर बुझ गई महेंद्र उर्फ गुड्डू की जिंदगी,
अब नगर पंचायत अध्यक्ष करेंगे सान्वी का कन्यादान
बालामऊ/हरदोई उ०प्र० का माहौल उस वक्त गमगीन हो गया, जब एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियां पलभर में मातम में बदल गईं। जिस आंगन में कुछ दिन पहले बेटी सान्वी के तिलक की रस्म पर ढोलक बजी थी, जहां रिश्तेदारों की हंसी गूंज रही थी, उसी घर में आज सिसकियां सुनाई दे रही हैं।
पश्चिमी बाजार निवासी संविदा बिजली कर्मी महेंद्र उर्फ गुड्डू सुबह रोज की तरह घर से निकले थे। जाते-जाते उन्होंने शायद बेटी की शादी की तैयारियों को देखकर मन ही मन कई सपने सजाए होंगे। किसे पता था कि यह घर से उनका आखिरी जाना होगा।
कछौना चौराहे पर बिजली फॉल्ट ठीक करते समय अचानक करंट ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। देखते ही देखते बेटी के अरमानों का सहारा, पत्नी की जिंदगी का साथी और बच्चों के सिर का साया हमेशा के लिए छिन गया।
घर में शादी के लिए रखे सामान अब परिवार की आंखों में आंसू बनकर चुभ रहे हैं। बेटी सान्वी बार-बार बस यही पूछ रही है पापा अब मेरी शादी में नहीं आएंगे क्या?
इस सवाल ने हर सुनने वाले की आंखें नम कर दीं।।
पत्नी सोनी की हालत ऐसी है कि उनकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। जिस पिता को बेटी की डोली विदा करनी थी, आज उसी पिता की अर्थी उठी। पूरा कस्बा इस दर्दनाक दृश्य को देखकर भावुक हो उठा।
घटना की खबर मिलते ही नगर पंचायत अध्यक्ष राधारमण शुक्ला पंकज और अधिशासी अधिकारी देवांशी दीक्षित अस्पताल पहुंचे। उन्होंने परिवार को सांत्वना दी और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया।
इसी बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। नगर पंचायत अध्यक्ष पंकज शुक्ला ने सान्वी का हाथ थामते हुए कहा
महेंद्र भले आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बेटी अब अकेली नहीं है। सान्वी की शादी उसी धूमधाम से होगी, जैसे एक पिता अपनी बेटी की करता है। कन्यादान भी मैं खुद करूंगा। बेटी की डोली अब रुकेगी नहीं।
उनके इन शब्दों ने गम में डूबे परिवार को सहारा दिया। कस्बे के लोगों का कहना है कि दुख की इस घड़ी में पंकज शुक्ला ने सिर्फ मदद नहीं की, बल्कि एक पिता की कमी को भरने की कोशिश की है।
आज कछौना की गलियों में सिर्फ एक ही चर्चा है
एक पिता चला गया, लेकिन इंसानियत ने बेटी का हाथ थाम लिया
महेंद्र उर्फ गुड्डू की मौत ने जहां पूरे कस्बे को रुला दिया, वहीं समाज की संवेदनशीलता ने यह एहसास भी कराया कि दुख कितना भी बड़ा क्यों न हो, अपनों का साथ टूटे हुए दिलों को जीने की ताकत दे ही देता है!!

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