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सहयोग समाजिक संस्था ने मातृ दिवस पर किया "एक दुपहरी सासु मां की छांव में' कार्यक्रम का आयोजन

मेरठ - सहयोग सामाजिक संस्था द्वारा विश्व मातृ दिवस को सासु मां को समर्पित करते हुए ' एक दुपहरी सासु मां की छांव में' कार्यक्रम का आयोजन शास्त्री नगर जिला सहकारी बैंक परिसर में किया गया। कार्यक्रम में कवयित्री डॉ पूनम शर्मा को भोली सास और शिक्षिका डॉ चुन्नी रस्तोगी को भली बहू का खिताब देकर आपसी तालमेल और पारिवारिक एकता का संदेश दिया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने अफसोस जताया कि सास बहू में सही ट्यूनिंग न होने से आज संयुक्त परिवार टूटने के कगार पर है। परिवार में पैसा है, पर सुकून नहीं। यह स्थिति परिवार और समाज दोनों के लिए ख़तरनाक है।
इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्यो के लिए छह समाजसेवियों -जनार्दन शर्मा, सत्य प्रकाश रस्तोगी, डॉ शशि खन्ना, राजबाला कपिल, सतीश अरोरा 'सहज, अमित अरोरा को 'सहयोग सम्मान-2026' की उपाधि से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्था सचिव अरविंद रस्तोगी 'दीप' ने संस्था के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण और समाज के सभी वर्गों में पारस्परिक सद्भाव संस्था का मुख्य उद्देश्य है।
कार्यक्रम की शुरुआत विशिष्ट अतिथि डॉ नीलम मिश्रा 'तरंग' द्वारा दीप प्रज्वलन एवं कवयित्री कमलेश तनहा द्वारा प्रस्तुत सासु मां वंदना से हुई। मुख्य अतिथि डॉ शशि खन्ना ने अपने प्रबोधन में कहा कि पहले लड़कियों की शादी 20 वर्ष तक हो जाती थी। ऐसे में जो लडकी बहू बनकर आती थी,वह कच्ची मिट्टी के घड़े की तरह होती थी,जिसे सास अपने हिसाब से ढाल लेती थी। अब लड़कियां 30 साल की उम्र में शादी कर रही है, जो परिपक्व हो चुकी होती है उन्हें अपने अनुरूप ढालना मुश्किल होता है।ऐसे में आपस में सामंजस्य ना बिठा पाना भी पारिवारिक बिखराव का मुख्य कारण है।
संस्था अध्यक्ष दिनेश शांडिल्य एडवोकेट ने कहा कि आज सास बहू के रिश्तों में खटास पैदा हो रही है,इस खटास को मिठास में बदलना ही कार्यक्रम का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि जो जन्म देती है,वह मां नहीं, वह जननी कहलाती है। असली मां सासु मां होती है, जो उसे संभालती है। भले बुरे का ज्ञान कराकर, पहनना -ओढना, सिखाकर कर उसके जीवन को निखारती है।
वक्ताओं का मानना था कि सास सिर्फ एक रिश्ता नहीं, पूरे परिवार का 'बैलेंस व्हील' होती है। पुरानी कहावतें चाहे जो कहें, हकीकत में सास के बिना घर अधूरा लगता है।
वक्ताओं का कहना था कि सास वो पहली पाठशाला है जहाँ बहू बिना किताब और बिना फीस दिए रीति-रिवाज, खान-पान, तीज-त्योहार सीखती है।
वक्ताओं ने कहा कि सासू. संकट में ढाल, खुशी में ढोल बन जाती है। भोली सास जब बहू को बेटी बना लेती है, तो मायके की कमी खलती ही नहीं। बुखार में सिर दबाना, डिलीवरी में रात-रात भर जागना, नौकरी पर जाने से पहले टिफिन पैक करना ये सब मां वाले काम सास चुपके से कर जाती है।
वक्ताओं का मानना था कि जब सास "अधिकार" छोड़कर "अपनापन" पकड़ लेती है, तब बहू "डर" छोड़कर "दुलार" पकड़ लेती है। तब सास तो मिट्टी की भी बुरी वाली कहावत खुद शर्म से मिट्टी हो जाती है और जगह लेती है नई लाइन- दुपहरी वाली छांव है सासु मां।
वक्ताओं ने कहा कि शादी शुदा जिंदगी में लड़की पक्ष के व्यक्तियों द्वारा ससुराल में दखल देना,सास बहू में आपसी सूझबूझ का अभाव , संस्कार रहित आधुनिक शिक्षा तथा मां बाप द्वारा बच्चों को संस्कारित न करना टूटते परिवार का बड़ा कारण है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ प्रेम कुमार शर्मा ने की। मंच संचालिका अरुणा पवांर ने कुशल एवं सुमधुर संचालन से सभी का मन मोह लिया । रेखा गिरीश, डॉ पूनम शर्मा, डॉ नीलम मिश्रा 'तरंग' ,कमलेश तनहा, नंदिनी रस्तोगी, रामकुमारी 'शगुन', डॉ यश कुमार ढाका,सतीश अरोरा 'सहज',सत्य प्रकाश रस्तोगी, दिनेश शांडिल्य,अमित अरोरा, डॉ सुधा शर्मा, तरुण रस्तोगी , डॉ प्रेम कुमार शर्मा, डॉ यश कुमार ढाका, डॉ ललित मोहन शर्मा आदि ने विचार व्यक्त कर गोष्ठी को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। डॉ ललित मोहन शर्मा ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

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