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मुख्यमंत्री के काफिले में लग्जरी गाड़ियां, जनता अब भी खटारा बसों के भरोसे क्या यही है विकास मॉडल?

झारखंड में एक बार फिर वीआईपी संस्कृति और आम जनता की बदहाल सुविधाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के काफिले में मर्सिडिज, टोयोटा लैंड क्रूजर और फॉर्च्यूनर जैसी महंगी और लग्जरी गाड़ियों के इस्तेमाल को लेकर विपक्ष और आम लोग सरकार पर निशाना साध रहे हैं। लोगों का कहना है कि एक तरफ सरकार के मंत्री और अधिकारी करोड़ों की सुविधाओं में सफर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम जनता आज भी जर्जर और खटारा बसों में सफर करने को मजबूर है।

ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक सार्वजनिक परिवहन की हालत खराब बताई जा रही है। कई बसों की स्थिति ऐसी है कि उनमें सफर करना भी जोखिम भरा माना जाता है। यात्रियों को भीड़, टूटे सीट, खराब इंजन और सुरक्षा की कमी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विकास केवल नेताओं और वीआईपी लोगों तक सीमित रह गया है?

विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार को पहले आम जनता की मूल सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतें आज भी कई क्षेत्रों में अधूरी हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार की लग्जरी गाड़ियों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जिसे लेकर जनता में नाराजगी देखी जा रही है।

हालांकि सरकार समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों के लिए उच्च स्तरीय वाहन सुरक्षा कारणों से जरूरी होते हैं। लेकिन जनता का सवाल यह है कि जब आम आदमी रोजाना खराब परिवहन व्यवस्था से परेशान है, तब सरकार को प्राथमिकता किसे देनी चाहिए जनता को या वीआईपी सुविधाओं को?

अब यह मुद्दा राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी लोग लगातार अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और पूछ रहे हैं कि आखिर झारखंड का असली विकास मॉडल क्या है?

आपकी क्या राय है? क्या सरकार को पहले जनता की सुविधाओं पर खर्च करना चाहिए या वीआईपी व्यवस्थाओं पर?

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