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बच्चों की मेहनत को धर्म से जोड़ना कितना सही?

झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) की 10वीं और 12वीं परीक्षा के परिणाम आने के बाद अब राजनीति भी शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर मंत्री इरफान अंसारी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि उन्होंने 12वीं की टॉपर राशिदा नाज को सम्मानित किया, लेकिन 10वीं के टॉपर्स को उसी तरह सम्मान नहीं मिला। इसके बाद कुछ लोग इसे हिंदू-मुस्लिम एंगल देने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, JAC मैट्रिक परीक्षा 2026 में प्रियांशु कुमारी, शिवांगी कुमारी, प्रेम कुमार साहू और सन्नी कुमार वर्मा ने संयुक्त रूप से राज्य में पहला स्थान हासिल किया था। सभी छात्रों ने 500 में से 498 अंक प्राप्त कर झारखंड का नाम रोशन किया। वहीं 12वीं परीक्षा में राशिदा नाज ने टॉप कर सुर्खियां बटोरीं, जिसके बाद मंत्री इरफान अंसारी धनबाद पहुंचकर उन्हें सम्मानित करने पहुंचे।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बच्चों की सफलता को धर्म और जाति के चश्मे से देखना सही है? शिक्षा, मेहनत और प्रतिभा का कोई धर्म नहीं होता। टॉपर चाहे हिंदू हो, मुस्लिम, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग से हर छात्र अपनी मेहनत से उस मुकाम तक पहुंचता है और सम्मान का हकदार होता है।

राजनीतिक बयानबाजी और सोशल मीडिया की बहस के बीच कई लोग यह भी कह रहे हैं कि जनप्रतिनिधियों को सभी प्रतिभाशाली छात्रों को समान रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि किसी भी वर्ग के छात्रों को भेदभाव महसूस न हो। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे बेवजह सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश मान रहे हैं।

समाज के लिए सबसे जरूरी यह है कि बच्चों की उपलब्धियों को राजनीति और धर्म से ऊपर रखकर देखा जाए। क्योंकि जब मेहनत की जगह धर्म पर बहस शुरू हो जाती है, तब असली मुद्दा और छात्रों का सम्मान दोनों पीछे छूट जाते हैं।

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