लहू से सींचा है भाजपा कार्यकर्ताओं ने बंगाल में कमल :- शाश्वत तिवारी
कुछ लोग आज भी इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि बंगाल में भाजपा को सत्ता चुनाव आयोग ने थाली में परोसकर दे दी। उन्हें लगता है कि EVM, केंद्रीय बल या दिल्ली का दखल भाजपा को जिता गया। मगर यह बात कहने वाले न तो बंगाल की जमीन जानते हैं और न ही वहां की राजनीतिक लड़ाई को समझते हैं।
क्योंकि बंगाल का कमल बैलेट से पहले खून और संघर्ष से खिला है।
2011 से 2025 तक बंगाल में भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई। किसी को बम से उड़ाया गया, किसी को पेड़ से लटकाया गया, तो किसी की लाश नदी में मिली। हजारों घर जलाए गए। नंदीग्राम हो या बीरभूम, कूचबिहार हो या बशीरहाट चुनाव के बाद बदले की राजनीति के नाम पर पूरे-पूरे गांव खाली करवा दिए गए। सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां के लोगों ने भाजपा का समर्थन किया था।
महिला कार्यकर्ताओं तक को नहीं बख्शा गया। आरोप लगे कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भय का माहौल बनाकर राजनीतिक दबाव बनाया गया। 2021 के चुनाव के बाद हुई हिंसा पर हाईकोर्ट को भी CBI जांच के आदेश देने पड़े।
सोचिए, जिस पार्टी के बूथ अध्यक्ष की लाश सुबह पेड़ से लटकी मिले और दोपहर में उसका बेटा उसी बूथ पर एजेंट बनकर बैठ जाए, वह मनोबल सिर्फ EVM से नहीं आता। जिस महिला का घर जला दिया गया हो और वह अगले चुनाव में फिर झंडा लेकर गली-गली घूमे, वह हिम्मत चुनाव आयोग नहीं देता।
बंगाल में 34 साल के वाम शासन और फिर 15 साल के ममता शासन के दौरान जो राजनीतिक दहशत का माहौल बना, भाजपा कार्यकर्ताओं ने उसे अपनी छाती पर झेला। मुकदमे, जेल, सामाजिक बहिष्कार, रोजगार छिनना सब कुछ सहा।
15 साल की कठोर तपस्या के बाद अब जाकर बंगाल में कमल खिला है।
राजनीतिक सफर का ग्राफ:
2011 1 विधायक
2016 3 विधायक
2019 लोकसभा 18 सांसद, पूरे देश में चर्चा
2021 विधानसभा 77 विधायक, मुख्य विपक्ष
2024 लोकसभा 20+ सीटें
2026 विधानसभा 207 सीटों के साथ सत्ता हासिल
यह ग्राफ एक दिन में नहीं बना। यह उन माताओं का इंतजार है जिन्होंने बेटों की तेरहवीं पर कसम खाई थी कि लड़ाई रुकेगी नहीं। यह उन हजारों परिवारों का सब्र है जो वर्षों तक राहत शिविरों में रहे, परेशानियां झेलीं, लेकिन झुके नहीं।
जो लोग कहते हैं कि चुनाव आयोग ने बंगाल जिता दिया, उन्हें उन कब्रों तक जाना चाहिए जहां भाजपा का झंडा ओढ़े कार्यकर्ता सो रहे हैं। उन जले हुए घरों की राख को छूकर देखना चाहिए। उन महिलाओं की आंखों में देखना चाहिए जिन्होंने सबकुछ खोकर भी भाजपा का साथ नहीं छोड़ा।
बंगाल में सत्ता किसी मशीन से नहीं मिली। यहां एक-एक वोट के पीछे एक-एक कुर्बानी है। 15 साल तक खून-पसीना बहाने और संघर्ष करने के बाद आज बंगाल में कमल खिला है।
यह सत्ता दिल्ली से नहीं, बंगाल की गलियों से निकली है। और यदि कोई इसे चुनाव आयोग का गिफ्ट कहता है, तो वह उन कार्यकर्ताओं और परिवारों के संघर्ष का अपमान करता है जिन्होंने लोकतंत्र की कीमत अपने प्राण देकर चुकाई।
(लेखक राजनीतिक समीक्षक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)