उपेक्षा के शिकार ग्रामीण जल स्रोत और प्राचीन धरोहर; बजट मिलने के बाद भी जनप्रतिनिधियों की 'हिम्मत' जवाब दे रही
उत्तराखंड के जनपद देहरादून अंतर्गत विकासखंड विकासनगर के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के सरकारी दावे धरातल पर दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। क्षेत्र की साझा विरासत कहे जाने वाले प्राचीन कुएं और उनके समीप बने विशाल छायादार पेड़ों के चबूतरे आज स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और आपसी सामंजस्य की कमी के कारण गंदगी के ढेर और खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
विकासनगर ब्लॉक के विभिन्न गांवों में स्थित ये पारंपरिक कुएं और पुराने पेड़ों के चबूतरे, जो कभी सामाजिक बैठकों और प्यास बुझाने का मुख्य केंद्र थे, अब कूड़े-करकट से परे पड़े हैं और पूरी तरह टूट चुके हैं। सबसे चौंकाने वाला विषय यह है कि विकासनगर के कुछ चिन्हित कुओं और उनके आसपास के सौंदर्यीकरण कार्य के लिए बजट आवंटित होने के बावजूद ग्राम पंचायत के जिम्मेदार प्रतिनिधि धरातल पर निर्माण कार्य शुरू कराने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। सार्वजनिक संपत्तियों पर बढ़ते अतिक्रमण और व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण विकास की राशि का सदुपयोग नहीं हो पा रहा है, जो सीधे तौर पर राजकीय कर्तव्य की अनदेखी और जनता के अधिकारों का हनन है।
भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय और जल जीवन मिशन के तहत 'सोर्स सस्टेनेबिलिटी' पर विशेष जोर दिया गया है, जिसके अनुसार विकासनगर जैसे महत्वपूर्ण ब्लॉक की हर ग्राम पंचायत को अपने पारंपरिक जल स्रोतों और उनसे जुड़ी प्राचीन धरोहरों को पुनर्जीवित करना अनिवार्य है। केंद्र सरकार की स्पष्ट गाइडलाइन है कि 'अमृत सरोवर' और 'कैच द रेन' जैसे अभियानों के माध्यम से इन जल धरोहरों को संरक्षित किया जाए। इसके साथ ही ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत सार्वजनिक जल स्रोतों व ऐतिहासिक पेड़ों के चबूतरों के पास कूड़ा फेंकना एक दंडनीय अपराध है और ग्राम पंचायत की यह वैधानिक जिम्मेदारी है कि वह इन स्थानों को अतिक्रमण मुक्त और स्वच्छ रखे। संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार ग्राम पंचायत को जल प्रबंधन और ग्रामीण बुनियादी ढांचे की पूर्ण शक्ति प्राप्त है। यदि किसी सार्वजनिक स्थल या चबूतरे पर स्थानीय विवाद की स्थिति है, तो जनप्रतिनिधि राजस्व विभाग व तहसील प्रशासन की मदद से सीमांकन कराकर कार्य निर्बाध रूप से पूरा कराने के लिए जवाबदेह हैं। अब ग्रामीणों की मांग है कि ब्लॉक प्रशासन और पंचायत इस दिशा में कड़ा रुख अपनाएं ताकि आवंटित सरकारी बजट का समय पर सदुपयोग हो सके और गांव की ये ऐतिहासिक धरोहरें पूरी तरह विलुप्त होने से बच सकें।