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कुश्तगान-ए-खंजर-ए-तस्लीम रा,हर जमां अज़ ग़ैब जाने दीगर अस्त।"हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (रह.)

हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (रह.) की दरगाह के दरवाजे पर वह मशहूर शेर लिखा हुआ है, जो उनके विसाल (इंतकाल) का सबब बना। यह वाकया रूहानी तारीख का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। कहा जाता है कि जब उनका इंतकाल हुआ, तब महफिल-ए-समा की एक मजलिस चल रही थी और हजरत अहमद जाम का यह
फारसी शेर पढ़ा जा रहा था:

"कुश्तगान-ए-खंजर-ए-तस्लीम रा,
हर जमां अज़ ग़ैब जाने दीगर अस्त।"

इसका आसान मतलब यह है कि "जो अल्लाह की रज़ा (मर्जी) के खंजर से शहीद होते हैं, उन्हें हर पल गैब से एक नई जिंदगी अता की जाती है।"

जब कव्वाल ने यह शेर पढ़ा, तो हजरत बख्तियार काकी पर 'वज्द' (रूहानी बेखुदी) तारी हो गया। आप इस शेर के मायने में इस कदर डूब गए कि तीन दिनों तक इसी कैफियत में रहे।

जब भी यह मिसरा दोहराया जाता, आपकी रूहानी तड़प और बढ़ जाती। आखिरकार, इसी रूहानी हाल में इस शेर को सुनते हुए आपकी रूह जिस्म से परवाज कर गई और आप अपने खालिक-ए-हकीकी से जा मिले। यही वजह है कि यह शेर आज भी उनकी दरगाह की शिनाख्त (पहचान) बना हुआ है।Bolti Delhi.

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