एक तरफ सत्ता का शॉर्टकट, दूसरी तरफ युवाओं पर लाठीचार्ज जनता में बढ़ रहा आक्रोश
देश और राज्यों की राजनीति में इन दिनों वंशवाद, बेरोज़गारी और राजनीतिक विशेषाधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। आम जनता के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर लोकतंत्र में नियम सिर्फ आम युवाओं के लिए ही क्यों हैं?
एक ओर नेताओं के बेटे बिना चुनाव लड़े सीधे मंत्री पद तक पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों पढ़े-लिखे युवा डिग्री हाथ में लेकर नौकरी की मांग कर रहे हैं और बदले में उन्हें सड़कों पर सरकारी लाठियां झेलनी पड़ रही हैं। यही विरोधाभास आज देश के युवाओं को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है।
बेरोजगार युवाओं का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाया, लेकिन नौकरियां या तो निकल नहीं रही हैं या भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं। कई राज्यों में परीक्षा पेपर लीक, भर्ती घोटाले और नियुक्तियों में देरी ने युवाओं का भरोसा तोड़ा है।
वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक परिवारों के वारिस बिना किसी जनसंघर्ष या चुनावी परीक्षा के सीधे सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंच जाते हैं। इससे आम युवाओं के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि राजनीति में योग्यता से ज्यादा परिवार और पहुंच मायने रखती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि युवाओं में व्यवस्था के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार जनता के पास है, तो बिना चुनाव लड़े मंत्री बनने की परंपरा आखिर कितनी उचित है?
युवाओं का कहना है कि सरकारों को सिर्फ भाषणों और वादों से आगे बढ़कर रोजगार, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और समान अवसर पर गंभीरता से काम करना होगा। क्योंकि जब पढ़ा-लिखा युवा नौकरी मांगने पर लाठी खाए और सत्ता के गलियारों में परिवारवाद हावी दिखे, तब लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि सरकारें युवाओं की नाराजगी को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी मानती हैं या इसे देश के भविष्य से जुड़ा गंभीर संदेश समझकर ठोस कदम उठाती हैं।