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असलीधर्मदधार्मिकता

अध्याय वर्तमान नकलूसी धर्म बनाम वास्तविक बुद्धत्व
व्याख्यान एवं गहन समझ

मनुष्य के इतिहास में एक समय ऐसा था जब बोध शब्द केवल विचार नहीं था।
वह एक जीवित अनुभव था।
किसी व्यक्ति के भीतर अचानक एक नई स्पष्टता जन्म लेती थी।
उसे लगता था जैसे भीतर कोई द्वार खुल गया हो।
एक ऐसी शांति, आनंद, प्रेम और मौन प्रकट होता था जिसका स्रोत बाहर नहीं था।
उस समय मानव बुद्धि आज जितनी विकसित नहीं थी।
न विज्ञान था,
न आधुनिक मनोविज्ञान,
न न्यूरोसाइंस,
न चेतना अध्ययन की भाषा।
इसलिए मनुष्य ने उस अनुभव को प्रतीकों में व्यक्त किया।
किसी ने कहा मुझे कृष्ण का दर्शन हुआ।
किसी ने कहा शिव प्रकट हुए।
किसी ने कहा देवी उतरी।
किसी ने कहा प्रकाश मिला।
किसी ने कहा ईश्वर मिला।
लेकिन वास्तविकता में वह किसी बाहरी व्यक्ति से मुलाकात नहीं थी।
वह मनुष्य के भीतर चेतना के केंद्र का जागरण था।
उस समय भाषा सीमित थी,
इसलिए बोध प्रतीकों में व्यक्त हुआ।
यहीं से धर्मों की शुरुआत हुई।
ध्यान रहे
धर्म की शुरुआत बुरी नहीं थी।
वह जीवित अनुभव की अभिव्यक्ति थी।
किसी व्यक्ति के भीतर जब बोध घटता था,
तो उसका जीवन बदल जाता था।
उसका चलना बदल जाता,
बोलना बदल जाता,
देखना बदल जाता,
जीना बदल जाता।
क्योंकि भीतर का केंद्र बदल गया था।
तब वस्त्र, मौन, एकांत, साधना, भिक्षा, जंगल, जटा, भगवा, नग्नता
ये सब मूल सत्य नहीं थे।
ये केवल उस भीतरी स्थिति की बाहरी अभिव्यक्तियाँ थीं।
लेकिन समय के साथ एक बड़ी भूल हो गई।
लोगों ने अनुभव को नहीं समझा,
केवल उसकी बाहरी शैली को पकड़ लिया।
जिस व्यक्ति ने भीतर मौन पाया था,
उसकी दाढ़ी देख ली गई।
जिस व्यक्ति ने भीतर स्वतंत्रता पाई थी,
उसका वस्त्र पकड़ लिया गया।
जिस व्यक्ति ने भीतर शांति पाई थी,
उसका आसन याद रखा गया।
और धीरे-धीरे धर्म जीवित अनुभव से हटकर
नकल का तंत्र बन गया।
यहीं से नकलूसी धर्म शुरू होता है।
नकलूसी धर्म का अर्थ है:
बिना भीतर बदले बाहर धार्मिक दिखना
बिना बोध के बोध की भाषा बोलना
बिना जागरण के गुरु जैसा अभिनय करना
बिना प्रेम के करुणा का प्रदर्शन करना
आज संसार में बड़ी मात्रा में यही हो रहा है।
लोग शास्त्रों की भाषा सीख लेते हैं,
लेकिन स्वयं को नहीं जानते।
लोग धार्मिक पहचान बना लेते हैं,
लेकिन भीतर भय, तुलना, ईर्ष्या और हिंसा भरी रहती है।
क्यों?
क्योंकि बोध नहीं हुआ
केवल बोध का अभिनय सीखा गया।
वास्तविक बुद्धत्व बिल्कुल अलग है।
वास्तविक बुद्धत्व व्यक्ति को विशेष नहीं बनाता।
वह उसे सहज बना देता है।
वह व्यक्ति अब किसी छवि को ढोता नहीं।
उसे यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती कि वह ज्ञानी है, धार्मिक है या पवित्र है।
क्योंकि भीतर का केंद्र शांत हो चुका है।
ऐसा व्यक्ति साधारण कपड़े पहन सकता है।
सामान्य जीवन जी सकता है।
परिवार में रह सकता है।
बाज़ार में काम कर सकता है।
और फिर भी भीतर मुक्त हो सकता है।
वास्तविक बोध का धर्म से संबंध हो सकता है,
लेकिन वह किसी धर्म की कैद में नहीं होता।
इसीलिए दुनिया के अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और धर्मों में भी बोध की घटनाएँ हुई हैं।
क्योंकि बोध मानव चेतना की संभावना है किसी एक परंपरा की संपत्ति नहीं।
जब भीतर का केंद्र जागता है,
तो मनुष्य में एक नई ऊर्जा बहने लगती है।
वह ऊर्जा प्रेम बनती है।
करुणा बनती है।
सृजन बनती है।
मौन बनती है।
उपस्थिति बनती है।
और सबसे गहरी बात:
ऐसा व्यक्ति दूसरों को बदलने की कोशिश नहीं करता।
उसकी उपस्थिति ही परिवर्तन का कारण बन सकती है।
यही वास्तविक गुरु-तत्व है।
गुरु वह नहीं जो अनुयायी बढ़ाए।
गुरु वह है जिसकी उपस्थिति तुम्हें स्वयं तक लौटा दे।
आज का संकट यह नहीं कि धर्म समाप्त हो गया।
संकट यह है कि धर्म की जगह धार्मिक अभिनय ने ले ली।
लोग प्रतीकों को सत्य समझ बैठे।
जबकि प्रतीक केवल संकेत थे।
तिलक संकेत था।
माला संकेत थी।
मंदिर संकेत था।
मूर्ति संकेत थी।
शास्त्र संकेत थे।
लेकिन संकेत को ही अंतिम सत्य मान लिया गया।
यहीं से मनुष्य बाहर भरता गया और भीतर खाली होता गया।
वास्तविक धर्म किसी पहचान का नाम नहीं।
वह चेतना की जागृति है।
और वास्तविक बुद्धत्व कोई धार्मिक चेहरा नहीं
बल्कि स्वयं में जागी हुई उपस्थिति है।

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