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ईश्वर दर्शन है।, Vedanta2.0

ईश्वर दर्शन स्वभाव, संभावना और स्वयं को देखने का रहस्य

मनुष्य का स्वभाव केवल आदत नहीं है।
स्वभाव वह सूक्ष्म केंद्र है
जिसमें उसकी सम्पूर्ण संभावना बीज की तरह छिपी होती है।
जैसे एक छोटे-से बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है,
वैसे ही मनुष्य के भीतर भी एक अदृश्य बिंदु है।
उसी बिंदु का विस्तार जीवन है।
धर्म का अर्थ उस बीज को किसी और जैसा बनना नहीं,
बल्कि उसे उसके अपने स्वभाव में विकसित होने देना है।
समस्या यह नहीं कि मनुष्य छोटा है।
समस्या यह है कि वह अपने भीतर के बीज को छोड़कर
दूसरों के वृक्ष बनने में लगा हुआ है।
इसीलिए संसार में इतनी उपलब्धियाँ हैं,
लेकिन आनंद नहीं है।
मनुष्य बन तो बहुत कुछ गया
धनवान, ज्ञानी, प्रसिद्ध, शक्तिशाली
लेकिन स्वयं नहीं हुआ।
और जो स्वयं नहीं हुआ,
वह भीतर कैसे शांत होगा?
स्वभाव का अर्थ है:
अपने भीतर की उस सूक्ष्म दिशा को पहचानना
जहाँ ऊर्जा सहज बहती है।
वही भीतर का बिंदु ईश्वर का जीवित अंश है।
ईश्वर बाहर बैठा कोई व्यक्ति नहीं,
बल्कि अस्तित्व की वही चेतना है
जो अनगिनत रूपों में स्वयं को देख रही है।
मनुष्य उसी देखने का माध्यम है।

****इसीलिए जीवन का आनंद कुछ बनने में नहीं,
बल्कि देखने में है। होने मै है बनने मै नहीं! ओर दिखाने में भी नहीं है!****

फूल इसलिए आनंदित नहीं कि वह किसी से बड़ा बन गया।
वह इसलिए पूर्ण है क्योंकि वह अपने स्वभाव में खिला।
नदी इसलिए सुंदर नहीं कि वह समुद्र से प्रतिस्पर्धा करती है।
वह इसलिए सुंदर है क्योंकि वह बहती है।
मनुष्य ने जीवन को प्रतियोगिता बना दिया,
***"जबकि अस्तित्व उसे दर्शन बनाना चाहता था। अपनी आंखों बनाना चाहता है, की मुझे कोई देखे लेकिन यह सब ख़ुद भगवान बनने में लगे है! मै भगवान दूसरा भक्त बन जाय यहीं पाखंडी है*****

यही कारण है कि संसार की हर वस्तु
आकाश, वृक्ष, प्रेम, पीड़ा, मृत्यु, मौन, संबंध
देखने योग्य हैं।
उन्हें पकड़ना नहीं,
उन्हें देखना है।
यही ईश्वर दर्शन है।
ईश्वर दर्शन किसी पत्थर की मूर्ति को देख लेना नहीं।
यदि देखने वाला स्वयं अंधा है,
तो मंदिर भी उसे सत्य नहीं दे सकता।
और यदि देखने वाला जाग गया,
तो पूरा अस्तित्व मंदिर बन जाता है।
तब वृक्ष भी उपनिषद हैं।
मौन भी गीता है।
जीवन भी ध्यान है।
ईश्वर ने स्वयं को देखने के लिए यह सृष्टि रची।
और मनुष्य उसी आत्म-दर्शन का सबसे सूक्ष्म दर्पण है।
लेकिन मनुष्य स्वयं को छोड़कर
दूसरों जैसा बनने में लगा है।
यही दुःख है।
तुम जो नहीं हो,
उसे पाने में जीवन नष्ट हो सकता है।
लेकिन जो तुम हो,
उसे देखने में ही मुक्ति संभव है।
इसलिए धर्म का अर्थ आदर्श बनना नहीं।
धर्म का अर्थ है
अपने भीतर के बीज को पहचानना,
उसे स्वीकृति देना,
और उसे पूर्ण खिलने देना।
यही स्वभाव है।
यही आत्मा है।
यही ईश्वर का जीवित रूप है।
और इसी को देखना
ईश्वर दर्शन है।, Vedanta2.0

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