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पटोरी का कड़वा सच : किश्तों पर टिकी शान और बिकती हुई पहचान ।

"बाप की ज़मीन बेचकर जो शान खरीदी है,
वो असल में ज़मीन नहीं, अपनी नस्लों की पहचान बेची है।

आज का भारत दो विरोधाभासों के बीच सांस ले रहा है। एक तरफ टीवी स्क्रीन पर 'तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था' का सुनहरा सपना है, तो दूसरी तरफ शाहपुर पटोरी की गलियों में अपनी पुश्तैनी जमीनें बेचकर 'मिडिल क्लास' होने का भ्रम पालता एक समाज। हालिया आर्थिक व्यवहार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में मध्यम वर्ग अब कोई आर्थिक श्रेणी नहीं, बल्कि एक "मानसिक दुविधा" बनकर रह गया है।

हमने खुद को तीन श्रेणियों में बांटाअमीर, मध्यम और गरीब।

असल में 'मध्यम वर्ग' का यह ठप्पा हमने खुद ही ओढ़ा है ताकि गरीबी के साथ जुड़ी सामाजिक शर्मिंदगी से बच सकें। यह श्रेणी हमें समाज में छद्म सम्मान तो देती है, लेकिन सरकार की नजरों में उन योजनाओं से वंचित कर देती है जो गरीबों के लिए आरक्षित हैं। नतीजा यह है कि हम न तो अमीरों की फेहरिस्त में शामिल हैं, न ही सरकारी राहत के हकदार।

विषमता की गहरी खाई
आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि देश की 50% से अधिक संपत्ति केवल 1% धनाढ्यों के पास है। जहाँ ये 1% लोग शादियों में करोड़ों उड़ाते हैं और बैंकों का कर्ज डकार कर विदेश उड़ जाते हैं, वहीं 'सो-कॉल्ड' मिडिल क्लास अपनी उम्र भर की पूंजी एक दिखावे वाली शादी या ईएमआई (EMI) पर लिए घर में झोंक देता है।

जबकि सच्चाई यह है कि अमीर कर्ज लेता है साम्राज्य विस्तार के लिए, और मध्यम वर्ग कर्ज लेता है अपनी झूठी शान को जिंदा रखने के लिए।

पटोरी जैसे तेजी से बढ़ते इलाकों में यह विरोधाभास सड़कों पर दौड़ता दिखता है। खेती की जमीनें बेची जा रही हैं ताकि दरवाजे पर एक 'बुलेट' खड़ी हो सके। बैंक में न्यूनतम बैलेंस न होने पर हम पेनल्टी देते हैं, लेकिन समाज में 'गरीब' कहलाने के डर से चुपचाप आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव झेलते हैं। बटुए में 100 रुपये नहीं, लेकिन सवारी 'रॉयल' चाहिएयही आज के छद्म मध्यम वर्ग का असली चेहरा है।

सरकार की 'दुधारू गाय'
सरकार के लिए यह वर्ग राजस्व का सबसे आसान जरिया है। फाइलों में किसानों और आम जनता के लिए ढेरों योजनाएं हैं, लेकिन धरातल पर भ्रष्टाचार का पहरा है। जब जमींदार अपनी जमीन बेचकर जीवन-यापन (Maintenance) करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि देश की कृषि नीति और आर्थिक ढांचा 'वेंटिलेटर' पर है। डॉलर के मुकाबले गिरता रुपया सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी वैश्विक हैसियत का गिरता हुआ पैमाना है।

अब जागने का वक्त है
हकीकत में देश में केवल दो ही वर्ग बचे हैं अमीर या गरीब । मिडिल क्लास तो दो पत्थरों के बीच पिसता वह गेहूं है जिसे अमीर और गरीब के बीच खत्म किया जा रहा है। अमीर कर्ज न चुकाए तो देश छोड़ देता है, गरीब को सरकार मुफ्त सुविधाएं देती है, लेकिन मिडिल क्लास अगर कर्ज न चुकाए तो उसकी संपत्ति कुर्क कर दी जाती है।

यदि आज इस वर्ग ने अपनी प्राथमिकताओं पर विचार नहीं किया और खुद को 'दिखावे की संस्कृति' से बाहर नहीं निकाला, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में केवल 'खाली जमीनें' और 'बैंक के नोटिस' ही मिलेंगे। वक्त आ गया है कि हम 'मध्यम वर्ग' के इस छद्म गौरव को छोड़कर अपनी वास्तविक लड़ाई लड़ें, वरना अमीरों और गरीबों के बीच की यह खाई कभी नहीं भरेगी।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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