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मेरा निजी नजरिया.....काश गलत साबित हो...

कभी-कभी मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या कुछ राज्य आंदोलनकारियों ने केवल 5000 पेंशन पाने के लिए ही संघर्ष किया था, और आज उसी में संतुष्ट होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो गए हैं। कुछ समय के साथ थककर बैठ गए, कुछ ने संघर्ष की राह छोड़ राजनीति का मार्ग चुन लिया, और कुछ केवल अवसरवादिता तक सीमित रह गए।
लेकिन दूसरी ओर आज भी ऐसे सच्चे आंदोलनकारी मौजूद हैं, जिनकी रगों में उत्तराखंड राज्य आंदोलन का वही जज्बा, वही त्याग और वही संकल्प बह रहा है। वे आज भी अधूरे राज्य को पूर्ण राज्य बनाने, स्थायी राजधानी गैरसैंण को उसका अधिकार दिलाने और उत्तराखंड की अस्मिता को मजबूत करने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं।
अब समय आ गया है कि हम स्वयं से प्रश्न करें क्या हम सच में संतुष्ट हैं? क्या जिन सपनों के लिए हजारों लोगों ने बलिदान दिया, वे पूरे हो गए हैं? यदि नहीं, तो फिर मौन क्यों?
आइए, अपने स्वाभिमान, अपने अधिकार और अपने भविष्य के लिए एक बार फिर एकजुट हों। स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष की इस ज्योति को प्रज्वलित करें। क्योंकि अधिकार कभी भीख में नहीं मिलते, उन्हें जागरूकता, एकता और संघर्ष से प्राप्त किया जाता है।

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