प्रशासनिक न्याय के कटघरे में शिक्षा विभाग: क्या सुरक्षित है महिला शिक्षकों का भविष्य?
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गया। बिहार में 'सुशासन' और 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य ज़मीनी स्तर पर न्याय सुनिश्चित करना है।
लेकिन गया जिला अधिकारी (DM) के जनता दरबार में हाल ही में सामने आया एक मामला विभाग के भीतर छिपी अराजकता और पद के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है।
मामला: सत्ता का अहंकार या नियमों की अनदेखी?
प्राथमिक विद्यालय अफजलपुर शेरघाटी में कार्यरत शांति कुमारी नामक एक महिला शिक्षिका ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
आवेदन संख्या DM2605047029 के अनुसार, उन्हें "असंवैधानिक और गैर-कानूनी" तरीके से नौकरी से हटा दिया गया है।
यह केवल एक स्थानांतरण या निलंबन का मामला नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर पद के दुरुपयोग (Abuse of Power) का संगीन आरोप है।
घटनाक्रम पर एक नज़र
पंजीकरण: आवेदन 04 मई 2026 को जिला पदाधिकारी, गया के समक्ष पंजीकृत किया गया।
सुनवाई: 07 मई 2026 को जिला शिक्षा कार्यालय, गया में इस पर सुनवाई हुई।
वर्तमान स्थिति: मामला अब DPO (स्थापना) को पत्र संख्या 1082 के माध्यम से अग्रसारित किया गया है।
उठते सुलगते सवाल
क्या शिक्षा विभाग के भीतर कुछ अधिकारी अपनी शक्तियों का उपयोग व्यक्तिगत रंजिश साधने के लिए कर रहे हैं?
एक महिला शिक्षिका को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सेवा से मुक्त कर देना न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह विभाग की कार्यप्रणाली पर भी कालिख पोतता है।
"यदि रक्षक ही भक्षक बन जाएं और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग नियमों को ताक पर रखकर फैसले लेने लगें, तो आम कर्मचारी न्याय की गुहार लेकर कहाँ जाएगा?"
निष्कर्ष
जिलाधिकारी श्री शशांक शुभंकर के संज्ञान में मामला आने के बाद अब गेंद शिक्षा विभाग के पाले में है।
पत्र संख्या 1082 की कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति बनकर न रह जाए, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
गया के इस 'जनता दरबार' से निकला यह मामला पूरे प्रदेश के शिक्षा विभाग के लिए एक लिटमस टेस्ट है।
क्या शांति कुमारी को उनका हक वापस मिलेगा, या भ्रष्टाचार के फ़ाइल इंसाफ़ का दम घोट देगी?