logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

बिहार कैबिनेट विस्तार: योग्यता या पहुँच? भागलपुर और बांका के कद्दावर चेहरों की अनदेखी पर उठे सवाल

8 मई, 2026
भागलपुर: बिहार में हाल ही में हुए सम्राट चौधरी सरकार के कैबिनेट विस्तार के बाद राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। जहाँ एक ओर नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण से सरकार में उत्साह का माहौल है, वहीं दूसरी ओर अंग और बांका क्षेत्र के कई कद्दावर विधायकों को कैबिनेट में जगह न मिलने से विधायकों के समर्थकों में भारी नाराजगी है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में पार्टी के लिए सीटें जीती थीं।
प्रमुख चेहरों की अनदेखी: क्या रहा कारण?
क्षेत्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि मंत्रिमंडल के चयन में इस बार भी "पहुँच" और "समीकरण" हावी रहे, जिसके कारण जमीनी पकड़ रखने वाले और योग्यता रखने वाले विधायकों को नजरअंदाज किया गया। इसमें प्रमुख रूप से तीन नाम चर्चा का केंद्र बने हुए हैं:
रोहित पांडेय (विधायक, भागलपुर): भागलपुर सदर जैसी महत्वपूर्ण सीट से कांग्रेस के गढ़ को ढहाकर जीत हासिल करने वाले भाजपा विधायक रोहित पांडेय को कैबिनेट में जगह मिलने की प्रबल संभावना थी। युवाओं के बीच लोकप्रिय और संगठन में गहरी पैठ रखने के बावजूद उन्हें मंत्री पद से दूर रखा गया।
मनीष कुमार (विधायक, धोरैया): बांका जिले की धोरैया विधानसभा से जदयू विधायक मनीष कुमार का नाम भी संभावितों की सूची में था।क्षेत्र में सक्रिय विधायक मनीष कुमार की छवि एक विकासपुरुष की रही है। क्षेत्र के विकास और सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता को देखते हुए उम्मीद थी कि उन्हें जिम्मेदारी मिलेगी।
मनोज यादव (विधायक, बेलहर): बेलहर से कद्दावर नेता मनोज यादव, जिन्होंने जदयू के टिकट पर अपनी मजबूती हमेशा साबित की है, उनकी अनदेखी ने भी समर्थकों को मायूस किया है। यादव समाज और स्थानीय विकास पर उनकी पकड़ के बावजूद उन्हें नजरअंदाज करना चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भागलपुर और बांका जैसे महत्वपूर्ण जिलों से इन विधायकों को मंत्री पद नहीं मिलने से आने वाले चुनावों में गठबंधन को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। यदि जमीन से जुड़े नेताओं को सरकार में उचित सम्मान नहीं मिलता, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि केवल प्रभावशाली लॉबिंग करने वाले ही सत्ता के करीब पहुँच सकते हैं।
फिलहाल, इन विधायकों ने सार्वजनिक रूप से कोई कड़ा विरोध नहीं जताया है, लेकिन उनके समर्थकों की खामोशी और सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल सरकार के लिए आने वाले समय में चुनौती बन सकते हैं। स्थानीय कार्यकर्ता मुकेश सिंह,दिलीप साह आदि ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:
"ऐसा लगता है कि जो पटना के गलियारों में ज्यादा 'पहुंच' रखते हैं या पैरवी कर सकते हैं, पद उन्हीं को मिले हैं। जिन्होंने जमीन पर पसीना बहाया, उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया।"

8
2277 views

Comment