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जो जन डाबर तैल लगावैबाबर नाम निकट नही आवै

जो जन डाबर तैल लगावै
बाबर नाम निकट नही आवै

ये 16 मार्च 1527 का दिन था। बाबर की फौज खानवा के मैदान में राणा सांगा से लोहा लेने को खडी थी। लेकिन सांगा का प्लान अलग था।

उसकी सेनाएं तेल लेने गयी थी।
तेल वही-डाबर का।

जिसके बारे में मशहूर था कि वह बाबर का नाम मिटा देती है। लेकिन पेगागस की मदद से सांगा की पूरी वजट्सप चैट बाबर तक आ रही थी।

बाबर इस टेक्टीक से वाकिफ़ था। पिछले साल इब्राहिम लोधी ने यह तेल ईजाद किया था।

जिस तरह लाल हिट कॉकरोच को, और काला हिट मच्छरों के खात्मा करता है, वैसे ही डाबर तेल, बाबर की सेना का खात्मा करता था।

अब बस इस तेल की सप्लाई चाहिए थी। जो स्ट्रेट ऑफ होरमुज से आने वाली थी। बाबर ने अपने प्रिय कांग्रेसियो से सम्पर्क किया। उन लोगों ने चीन की मदद से स्ट्रेट ऑफ होरमुज बन्द कर दी।

सप्लाई अटक गई।

बिना डाबर के तेल, बाबर का नाम कैसे मिटता। आखिर इब्राहिम हारा, और बाबर पानीपत जीत गया। लेकिन यह टेक्निक किसी तरह राणा सांगा को मिल गयी थी।

अब भयंकर संकट सामने था।

बाबर ने सोची तदबीर
जिससे चमक उठे तकदीर

उसने अपने चार्ली और अल्फा कमांडो तेल की सप्लाई रोकने में लगा दिए।

रात के अंधेरे में जैसे ही सप्लाई आयी, कमांडोज ने उसे घेर लिया। कांच की बोतले तोड़ दी। और प्लास्टिक की बोतलों में डाबर तेल फेंक, उसमे अडानी जी का फार्च्यून रिफाइंड ऑयल भर दिया।

इसकी किसी को कानोकान खबर नही हुई।

अगली सुबह युद्ध शुरू हुआ।

राणा सांगा घोड़े पर सवार होकर बोले- अरे ओ सिपाहियो! आज डाबर आंवला केश किंग तेल लगाकर चलो। बाल चमकेंगे तो हौसला भी चमकेगा। बाबर को देखते ही तेल लगाओ, नाम मिटाओ" का नारा लगाना!

सिपाही: सर, लेकिन बाबर ने रात में ही हमारी सप्लाई रोक दी है!
सांगा- कैसे?
सिपाही: उसने अफगान गुर्गों को भेजकर सारे डाबर के तेल के कंटेनर पंचर कर दिए! आंवला, बादाम, ब्राह्मी सब सूखे पड़े हैं! अब हमारे बाल रूखे हैं,

और हौसला भी सूख गया है हुजूर।

दूसरी तरफ उसके सेनापति ने तोपचियों में तेल बांटा। उन्हें क्या पता था कि इसमे डाबर नही, फॉरच्यून का पाम ऑइल भरा है। वे तेल चुपड़ कर लड़े।

लेकिन पाम ऑइल में डाबर वाला दम कहाँ।

सारे खेत रहे। बाबर युद्ध जीत गया। पूरे हिंदुस्तान पर उसकी बादशाहत छा गयी। मुगल वंश उदय हुआ।

इतिहास की किताबो में पीएन ओक ने लिखा- राजपूत सेनाएं वीरता से लड़ी। मगर बिना तेल के बाल सूख गए, हौसला टूट गया।

इतिहास के इस चेप्टर की पंचलाइन थी- जिसकी तेल सप्लाई कट गई, उसकी जीत भी कट गई।

यह किताब कांग्रेसियो ने दबा दी।

मगर सत्य पराजित हो सकता है, परेशान नही। एक दिन, पराजित सत्य का वह पन्ना बिना परेशानी के, व्हाट्सप पर अवतरित हुआ। जिसमे लिखा था-

जो जन डाबर तैल लगावै
बाबर नाम निकट नही आवै

पन्ना वाइरल हो गया। डाबर तेल की बिक्री में इजाफा हुआ। पार्टी ने स्टॉक भर भरकर कैडर में बांटा। औऱ फिर सँगठन की शक्ति, ज्ञानेश के आशीर्वाद और डाबर तेल की चिकनाई से युद्ध का श्रीगणेश किया।

औऱ बाबर की मौत के 600 साल बाद, भारत के नौनिहालों ने उसका नाम बंगाल से मिटा दिया।

लेकिन जी अभी भरा नही है। वहां तीन दिन से गली गली गूंज रहा है

तेल लगाओ डाबर का
नाम मिटाओ बाबर का

भामाकीजै!!

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