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सत्ता का शिखर और विकास की ढलान: शाहपुर पटोरी की कसौटी पर भाजपा

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिवेश में एक विचित्र विरोधाभास देखने को मिलता है। एक तरफ भव्य नारों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गूँज है, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता आम आदमी। उत्तर भारत की राजनीति, विशेषकर बिहार में, आज यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या 'धार्मिक ध्रुवीकरण' का शोर 'विकास की चीख' को दबाने का माध्यम बन गया है?

'मर्यादा पुरुषोत्तम' राम का नाम जब चुनावी रैलियों में वोट बटोरने का साधन बनता है, तो मर्यादा की परिभाषा ही बदल जाती है। धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है, लेकिन जब इसे राजनीतिक ढाल बनाया जाता है, तो जनता की जवाबदेही से बचने का रास्ता खुल जाता है। शाहपुर पटोरी जैसे क्षेत्रों में मतदाता आज भी भावनाओं के ज्वार में बहकर मतदान तो कर देता है, लेकिन क्या मतदान के बाद उसकी थाली में रोटी और क्षेत्र में अस्पताल सुनिश्चित हो पाते हैं?

उत्तर बनाम दक्षिण: शिक्षा और प्राथमिकता का अंतर

दक्षिण भारत के राज्यों ने अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए भी 'विकास' को राजनीति के केंद्र में रखा है। वहां शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी मुद्दे हैं। इसके विपरीत, उत्तर भारत के पट्टी में 'धार्मिक गोलबंदी' को विकास का विकल्प मान लिया गया है। यह एक गंभीर चेतावनी हैयदि मतदाता केवल भावनाओं पर वोट देगा, तो जनप्रतिनिधि विकास के प्रति उदासीन ही रहेगा।

उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का कद राष्ट्रीय राजनीति में भले ही बड़ा हो, लेकिन उनके प्रभाव की असली परीक्षा पटोरी के स्वास्थ्य केंद्रों और जर्जर सड़कों पर होनी चाहिए।

स्वास्थ्य का संकट:-जब स्थानीय स्तर पर डायलिसिस जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध न हो, तो बड़े पदों की चमक फीकी लगने लगती है।

नगर परिषद की स्थिति:-नगर परिषद और अनुमंडल का दर्जा प्राप्त होने के बाद भी यदि बुनियादी ढांचा (Infrastructure) पुराने ढर्रे पर है, तो यह विकास के दावों की पोल खोलता है।

"दूसरे राज्यों में जाकर विकास की गाथा सुनाना और अपने ही क्षेत्र को उपेक्षित छोड़ देना, जनसेवा नहीं बल्कि केवल 'सत्ता प्रबंधन' है।"

आजकल "मुफ्त" की राजनीति (Freebie Culture) ने लोकतंत्र को पंगु बना दिया है। टैक्सपेयर्स का पैसा ठोस बुनियादी ढांचे के बजाय तात्कालिक लाभ वाली योजनाओं में झोंक दिया जाता है। यह वोट बैंक सुरक्षित करने का तरीका तो हो सकता है, लेकिन राष्ट्र निर्माण का नहीं। पटोरी की जनता को यह समझना होगा कि चुनाव के समय मिला 'लोभ' उनके अगले पांच साल के 'अधिकार' को निगल रहा है।

भाजपा के लिए यह समय केवल चुनावी जीत का उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। क्या सत्ता का केंद्रीकरण जनहित की बलि ले रहा है? लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब विपक्ष सशक्त हो और जनता जागरूक।

शाहपुर पटोरी जैसे क्षेत्रों को अब 'नारों' से आगे बढ़कर 'नीतियों' पर सवाल पूछना होगा। विकास का पहिया केवल धर्म की पटरी पर नहीं, बल्कि अस्पताल, स्कूल और रोजगार की जमीन पर चलना चाहिए। यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह जरूर पूछेंगी कि जब विकास की नींव रखी जा रही थी, तब हम भावनाओं के शोर में क्यों सो रहे थे?

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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