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शीर्षक: पानी की पुकार: धीरज रमौल की और से

क्या सच में
अगला युद्ध पानी पर होगा?
क्या इंसान इतना प्यासा हो जाएगा
कि इंसानियत ही भूल जाएगा?

नदियाँ जो कभी गीत सुनाती थीं,
आज खामोश बहती हैं,
तालाब जो जीवन देते थे,
अब खाली आँखों जैसे लगते हैं।

बूंद-बूंद को तरसेगा जब संसार,
तब समझ आएगी इसकी कीमत अपार,
आज जो नल खुला छोड़ देते हैं हम,
कल उसी के लिए होंगे संघर्ष हरदम।

कहीं खेत सूखेंगे, कहीं शहर रोएंगे,
बच्चों के हाथों में खाली घड़े होंगे,
और तब शायद हम पूछेंगे खुद से-
क्या यही विकास के रास्ते थे?

ना बनाओ पानी को जंग की वजह,
बनाओ इसे जीवन का साज़,
आओ मिलकर कसम ये खाएं,
हर बूंद को बचाकर भविष्य सजाएं।

क्योंकि अगर आज नहीं संभले हम,
तो कल इतिहास ये कहेगा-
इंसान ने खुद अपनी प्यास से
अपना ही संसार जला दिया।

आओ, पानी को बचाएं
ताकि कल जंग नहीं,
जीवन की कहानी लिखी जाए।

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