वही ज़मीन, वही दस्तूर: बंगाल का सियासी आइना....
1. समय का पहिया: जो बोया, वही पाया..
कहते हैं राजनीति में कोई भी किला अभेद्य नहीं होता। जो तरीका कभी वामपंथ (CPIM) के गढ़ को ढहाने के लिए अपनाया गया था, आज वही हथियार तृणमूल के खिलाफ इस्तेमाल होते दिख रहे हैं। बंगाल की राजनीति का यह क्रूर सच है कि यहाँ सत्ता सिर्फ 'वोट' से नहीं, बल्कि 'दफ्तरों' और 'इलाकों' पर कब्ज़े से तय होती रही है।
2. कालचक्र की मार
"कल जो तुम्हारा था, आज वो किसी और का है,
ये वक्त का पहिया है साहब, हर बार नया सवेरा लाता है।"
एक दौर था जब 'लाल झंडे' को हटाकर 'घास-फूल' (TMC) ने अपनी जड़ें जमाई थीं। उस वक्त भी हिंसा और दफ्तरों पर कब्ज़े की खबरें आम थीं। आज जब 'कमल' (BJP) अपना विस्तार कर रहा है, तो दृश्य वही हैं, बस किरदार बदल गए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सत्ता का घमंड अक्सर इंसान को यह भुला देता है कि वक्त हमेशा बलवान होता है।
3. 'एक्शन' का 'रिएक्शन'
न्यूटन का तीसरा नियम राजनीति पर भी सटीक बैठता है। जब एक दल दूसरे दल के कार्यकर्ताओं और दफ्तरों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है, तो वह अनजाने में एक ऐसी संस्कृति को जन्म देता है जो भविष्य में उसी के लिए खतरा बन जाती है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र या वर्चस्व की जंग?
बंगाल की चुनावी बिसात पर यह 'जैसे को तैसा' वाली स्थिति वाकई सोचने पर मजबूर करती है।
टीएमसी ने जो वामपंथियों के साथ किया...
बीजेपी वही आज टीएमसी के साथ कर रही है...
और जनता बस इस चक्रव्यूह को देख रही है।
सच हैवक़्त पलटकर जवाब ज़रूर देता है, और जब वो देता है, तो उसकी गूँज बहुत गहरी होती है।