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कमल का फूल

शांत सरोवर के आँचल में, खिलता सुंदर कमल,
कीचड़ में रहकर भी देखो, रहता कितना निर्मल।
मंद-मंद मुस्काता जैसे, कोई प्यारा बालक,
प्रकृति की गोदी में पलता, कोमल इसका तन-मन।

भोर हुई जब नभ में फैली, अरुणिम स्वर्णिम लाली,
धीरे-धीरे पंखुड़ियों पर, आई नई उजाली।
ओस बूँद मोती बन-बनकर, इसकी शोभा बढ़ाती,
शीतल पवन छूकर इसको, मधुर गीत है गाती।

सूरज की पहली किरणें जब, जल पर चमक बिखेरें,
कमल तभी मुस्काकर अपने, सुंदर रूप सँवारे।
मानो कोई देवदूत हो, नभ से धरा पर आया,
धरती को सौंदर्य बाँटने, ईश्वर ने भेजा पाया।

जल की लहरों संग यह डोले, फिर भी रहे संभलकर,
जीवन की हर कठिन डगर में, चलता जैसे हँसकर।
सिखलाता है हमें निरंतर, जीवन का यह ज्ञान,
कीचड़ में भी रहना सीखो, रखकर निर्मल मान।

इसके कोमल गुलाबी दल पर, भँवरे गान सुनाएँ,
मधु की चाहत में आकर वे, प्रेम सुधा बरसाएँ।
तितली रंग-बिरंगे पंखों से, इसके पास मँडराए,
प्रकृति का अनुपम यह दृश्य, सबके मन को भाए।

देवी लक्ष्मी का प्रिय आसन, इसका ऊँचा मान,
मंदिर-मंदिर पूजित होता, पाकर सच्चा सम्मान।
भारत की पावन धरती ने, इसको गौरव माना,
राष्ट्रीय पुष्प बनाकर इसका, जग में मान बढ़ाना।

ना इसको अभिमान रूप का, ना वैभव का मोह,
सरल हृदय से सबको देता, प्रेम भरा संदेश।
कहता जीवन में चाहे कितने, संकट आएँ भारी,
सत्य, धैर्य और पवित्रता से, जीत मिलेगी सारी।

जब वर्षा की बूँदें गिरतीं, जल में लहर उठातीं,
कमल की कोमल पंखुड़ियों पर, मोती-सी चमक आती।
मानो प्रकृति स्वयं सजाकर, इसका रूप निहारे,
और गगन के सारे तारे, इसकी छवि पर वारे।

हे सुंदर कमल! तू सचमुच, प्रकृति का वरदान,
तेरी महिमा गाते-गाते, थक जाए यह गान।
तू हम सबको राह दिखाता, जीवन जीने की,
निर्मल रहकर खुशबू बाँटो, शिक्षा देता प्रीति की।

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