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भवानीपुर का महासंग्राम: ममता बनर्जी की अभेद्य किले में ऐतिहासिक हार और बंगाल की राजनीति का नया अध्याय

पश्चिम बंगाल की राजनीति के इतिहास में साल 2026 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है जिसने दशकों पुराने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट कर रख दिया, जहाँ सबसे बड़ा उलटफेर कोलकाता की प्रतिष्ठित भवानीपुर विधानसभा सीट पर देखने को मिला। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थकों द्वारा 'बंगाल की बेटी' और राजनीति की 'अजेय योद्धा' माना जाता था, उन्हें अपने ही सबसे मजबूत गढ़ भवानीपुर में भाजपा के शुभेंदु अधिकारी के हाथों 15,105 मतों के अंतर से करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। यह हार केवल एक विधानसभा सीट का नुकसान नहीं थी, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस के उस तिलस्म के टूटने का प्रतीक थी जिसे ममता बनर्जी ने सालों की मेहनत और जमीनी संघर्ष से खड़ा किया था। चुनाव के शुरुआती दौर से ही भवानीपुर में तनाव और उत्साह का माहौल था, जहाँ एक तरफ टीएमसी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थी, वहीं दूसरी तरफ शुभेंदु अधिकारी ने 'अन्याय के खिलाफ युद्ध' का नारा देकर मतदाताओं के बीच अपनी गहरी पैठ बना ली थी। मतगणना के दिन जैसे-जैसे राउंड दर राउंड नतीजे सामने आने लगे, भवानीपुर की गलियों में सन्नाटा पसरने लगा क्योंकि ममता बनर्जी लगातार पिछड़ रही थीं। शहरी मतदाताओं का मोहभंग, भ्रष्टाचार के आरोप और सत्ता विरोधी लहर ने उस भवानीपुर में सेंध लगा दी जिसने कभी ममता को भारी बहुमत से जिताया था।

ममता बनर्जी की इस हार ने न केवल पश्चिम बंगाल में 15 साल के टीएमसी शासन का अंत किया, बल्कि पार्टी के भीतर और बाहर उनके नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भवानीपुर के इस ऐतिहासिक जनादेश ने बंगाल की सत्ता की चाबी भाजपा को सौंप दी, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक युग का उदय हुआ है और ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर की शुरुआत हो गई

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