शाहपुर पटोरी की सिसकती प्रतिभाएं: व्यवस्था की "शतरंज" में मात खाते हमारे असली नायक
शाहपुर पटोरी (समस्तीपुर) :-शाहपुर पटोरी बिहार के नक्शे पर एक छोटा सा नाम, लेकिन यहाँ की मिट्टी की तासीर में संघर्ष और स्वाभिमान का अद्भुत मिश्रण है। आज जब दिल्ली के गलियारों से "विश्वगुरु" बनने का शोर गूँज रहा है, तब पटोरी की तंग गलियों में दो ऐसी प्रतिभाएं सिस्टम की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ रही हैं, जिनकी चीख शायद पटना और दिल्ली के बंद कमरों तक नहीं पहुँच पा रही।
संजीव पहलवान: अखाड़े का वह शेर, जिसे 'फाइलों' ने पछाड़ दिया
पटोरी की पुरानी बाजार की गलियों में एक नाम गूँजता है । "संजीव पहलवान"।
संजीव वह युवा है जिसने 2007 से अब तक राज्य स्तर की कुश्ती में प्रतिद्वंदियों को धूल चटाई और पटोरी के मान का परचम लहराया। लेकिन आज उसकी आँखों में जीत की चमक नहीं, बल्कि उपेक्षा का गहरा दर्द है।
बिहार सरकार का नारा था "मेडल लाओ, नौकरी पाओ", लेकिन संजीव के लिए यह वादा महज एक कागजी नाव साबित हुआ जो भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के दरिया में डूब गई। खेल विभाग के चक्कर काटते-काटते संजीव के जूते घिस गए, पर 'पॉलिसी' का हवाला देकर उसे दरकिनार कर दिया गया। जब एक खिलाड़ी को अपनी डाइट और अभ्यास के बजाय अपने बुजुर्गों की दवा और घर की रोटी की चिंता सताने लगे, तो समझ लीजिए कि उस देश में 'खेलो इंडिया' सिर्फ विज्ञापनों में चल रहा है। "कैमराजीवी" सत्ता को मेडल जीतने के बाद फोटो खिंचवाना तो याद रहता है, लेकिन पसीना बहाते खिलाड़ी की फटी हुई बनियान और खाली थाली कभी दिखाई नहीं देती।
पटोरी का दूसरा हीरा है "चंद्र मोहन सिंह"। एक ऐसा युवा उद्यमी और फिल्म निर्माता जिसने अपनी फिल्म "जीवन की शतरंज" के माध्यम से पटोरी की पहचान को राष्ट्रीय पटल पर अंकित करने का साहस किया। फिल्म का आधा हिस्सा पटोरी की ही गलियों में फिल्माया गया ताकि यहाँ के युवाओं को रोजगार और प्रेरणा मिल सके।
विडंबना देखिए, जब अपनी कला के प्रमाणीकरण और सहयोग के लिए चंद्र मोहन जिला प्रशासन के द्वार पहुँचे, तो जिलाधिकारी (DM) महोदय के पास उनसे मिलने के लिए चंद मिनट भी नहीं थे। जिस लोकतंत्र में जनता के टैक्स से मंत्रियों और नौकरशाहों के लाव-लश्कर पलते हों, वहाँ एक कलाकार का 'साहब' से मिलने के लिए तरसना 'ब्रिटिश काल' की तानाशाही की याद दिलाता है। आखिर ये कला और संस्कृति मंत्रालय किस काम के, अगर वे अपने ही क्षेत्र के उभरते सितारों को एक मुलाकात का समय तक न दे सकें?
व्यवस्था की चक्की और चाटुकार मीडिया
नीरज चोपड़ा के गोल्ड जीतने पर छाती ठोकने वाला 'चौथा स्तंभ' आज पटोरी के इन युवाओं के संघर्ष पर मौन है। मीडिया जब सत्ता की चाटुकारिता में व्यस्त हो जाए, तो वह 'जनता की आवाज़' नहीं बल्कि 'सरकार का भोंपू' बन जाता है। एक तरफ हम बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहे हैं और दूसरी तरफ संजीव और चंद्र मोहन जैसे आत्मनिर्भर बनने की चाह रखने वाले युवाओं की कमर तोड़ रहे हैं।
विज्ञापनों से नहीं, युवाओं के सम्मान से बनेगा देश
यह पटोरी का ही नहीं, बल्कि समूचे भारत का दुर्भाग्य है कि यहाँ प्रतिभाएं सिस्टम की चक्की में पिसकर दम तोड़ देती हैं। संजीव जैसे पहलवानों की गुमनामी और चंद्र मोहन जैसे फिल्मकारों की उपेक्षा यह बताती है कि हम अभी 'विश्वगुरु' बनने से बहुत दूर हैं। सरकार को यह समझना होगा कि आलीशान महलों और विज्ञापनों से देश महान नहीं बनता, बल्कि देश तब महान बनता है जब संजीव जैसे युवाओं को अखाड़े में सम्मान और चंद्र मोहन जैसे कलाकारों को प्रशासनिक संबल मिलता है।
पटोरी का यह आक्रोश आज शांत जरूर है, पर यह व्यवस्था से सवाल पूछना बंद नहीं करेगा।
"मेडल आए तो फोटो खिंचवाने सब आएँगे,संघर्ष की भूख में मगर, सब मुँह चुराएँगे।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT